जपुजी श्री गुरुनानकजी की आध्यात्मिक वाणी के साथ ही अद्वितीय साहित्यिक रचना भी है। इसकी प्रश्नोत्तरी शैली पाठक के भावों पर अमिट छाप छोती है। इसमें स्वयं गुरुजी ने जिज्ञासु के मन के प्रश्नों या आशंकाओं का उल्लेख करके उनका बतर्कपूर्ण ढंग से समाधान किया है।
इसमें संदेह नहीं कि जपुजी एक दार्शनिक और विचार प्रधान कृति है और इसकी रचना गुरुजी की अन्य वाणी की भाँति रागों के अनुसार नहीं की गई है। किंतु फिर भी इसमें अनेक छंदों का प्रयोग किया गया है। इसमें मुख्य छंद, दोहा, चौपाई तथा नाटक आदि हैं। जपुजी के आरंभ और अंत में एक श्लोक है।
जपुजी के पहले चरण की पहली तीन पंक्तियों का तुकांत एक है और उसमें आगे तीन पंक्तियों का अलग। 'एक ओंकार...' प्रसादि स्तुति है। 'आदि सच... ही भी सच' भी मंत्र स्वरूप वार्तकमयी स्तुति है। वार की भाँति पंक्तियों का तुकांत भी मध्य से ही मिलता है। जैसे
हुकमी उत्तम नीचु हुकमि लिखित दुखसुख पाई अहि । इकना हुकमी बक्शीस इकि हुकमी सदा भवाई अहि ॥
मध्य अनुरास का एक उदाहरण-
सालाही सालाही एती सुरति न पाइया। नदिआ अते वाह पवहि समुंदि न जाणी अहि ॥
इसी तरह कहा जा सकता है कि पौके रूप में विचार अभिव्यक्त करने का प्रारंभ गुरुनानक ने किया। कुछ शब्दों में बार-बार दोहराने से भी संगीतमयी लय उत्पन्न हो गई है। जैसे- तीसरे चरण में 'गावे को' का बार-बार दोहराना सूत्र शैली में शब्दों का प्रयोग बहुत संक्षिप्त रूप से किया गया है। इस संक्षिप्तता तथा संयम के लिए रूपक का प्रयोग अक्सर होता है। जपुजी में रूपक का अधिकतर प्रयोग किया गया है। जैसे-
पवणु गुरुवाणी पिता माता धरति महतु । दिवस शति दुई दाई दाइआ खेले सगलु जगतु ॥
जपुजी के अंतिम चरण में सुनार की दुकान का रूपक मनुष्य के सदाचारी जीवन तथा आत्म प्रगति के साधनों को प्रकट करता है। इसी तरह शरीर को 'कपकहना जिसमें शरीर का नाश तथा फिर नवरूप धारण करने की प्रक्रिया जान पती है। 'आपे बीजे आपे ही खाहु' किसानी जीवन के क्रियाकर्म सिद्धांत को स्पष्ट करता है।
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