- एकता सिन्हाधार्मिक सौहार्द की कहानी बल्लभगढ़ के राजा नाहर सिंह के मुँह बोले भाई एवं फर्रुखनगर के नवाब अहमद अली खां (जिन्हें फर्रुख सीयत के नाम से भी लोग जानते हैं) की शहादत अब लोगों को भले ही याद न हो मगर उनके द्वारा बनाए गए महल, मस्जिद और अन्य ऐतिहासिक इमारतें आज भी उनकी याद ताजा कर रही हैं। फर्रुखनगर के राजीव चौक पर बनी मस्जिद दुनिया की आम मस्जिदों से बिलकुल अलग है। कारण, इसके अंदर नमाज नहीं पढ़ी जाती, बल्कि सुबह-शाम गुरबानी का पाठ और भगवान राम की आरती सुनाई देती है। इससे क्षेत्र का पूरा वातावरण धार्मिक हो जाता है। इस कहानी के पीछे हकीकत यह है कि भारत-पाकिस्तान के बँटवारे के समय इस इलाके में रहने वाले सारे मुस्लिम पाकिस्तान चले गए थे। इस कारण इस इलाके में एक भी व्यक्ति इस्लाम धर्म को मानने वाला नहीं बचा। बँटवारे के बाद पाकिस्तान में रहने वाले हिंदू और सिख फर्रुखनगर में आकर रहने लगे। मस्जिद के अंदर बने मंदिर के पुजारी रमेश का कहना है कि अलग-अलग धार्मिक भावनाओं के चलते उन्होंने यहाँ कई देवी-देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित की हैं। इसलिए इस पवित्र मस्जिद में जहाँ एक ओर भगवान राम की सपरिवार स्थापना की गई है तो दूसरी तरफ मंदिर के दूसरे कोने में गुरु ग्रंथ साहब रखे गए हैं। इस मस्जिद का नाम सीता-राम मंदिर फर्रुखनगर (गुरुद्वारा) है। पिछले 16 साल से इस मंदिर में पुजारी रमेश ही हिंदू और सिख दोनों के ही महंत की भूमिका निभा रहे हैं।यहाँ के निवासियों का मानना है कि मस्जिद के अंदर दो धर्मों की पूजा-अर्चना अपने आप में एक मिसाल है। यही नहीं फर्रुखनगर में लोगों के अंदर एकता और भाईचारे की भावना भी औरों से अलग है। दोनों धर्मों के तीज त्योहार लोग एक साथ मनाते हैं। इस मस्जिद की मान्यता यह भी है कि यहाँ जो भी मुराद सच्चे दिल से माँगी जाती है, उसे वाहेगुरु और भगवान राम पूरा करते हैं। |