मुख पृष्ठ > धर्म-संसार > धर्म-दर्शन > धार्मिक स्थल > भगवान्‌ श्रीकृष्ण की व्रजभूमि
सुझाव/प्रतिक्रियामित्र को भेजियेयह पेज प्रिंट करें
 
भगवान्‌ श्रीकृष्ण की व्रजभूमि
तब फिर बताइए व्रजभूमि की बराबरी कौन स्थान कर सकता है? हिंदुस्थान में अनेक तीर्थ स्थान हैं, सबका महात्म्य है, भगवान्‌ के और-और भी जन्मस्थान हैं पर व्रजभूमि की बात ही कुछ निराली है। यहाँ के नगर-ग्राम, मठ-मंदिर, वन-उपवन, लता-कुंज आदि की अनुपम शोभा भिन्न-भिन्न ऋतुओं में भिन्न-भिन्न प्रकार से देखने को मिलती है। अपनी जन्मभूमि से सभी को प्रेम होता है फिर वह चाहे खुला खंडहर हो और चाह सुरम्य स्थान, वह जन्मस्थान है, यह विचार ही उसके प्रति होने के लिए पर्याप्त है।

इसी से सब प्रकार से सुंदर द्वारका में वास करते हुए भी भगवान्‌ श्रीकृष्ण जब व्रज का स्मरण करते थे, तब उनकी कुछ विचित्र ही दशा हो जाती थी।

जब व्रज भूमि के वियोग से स्वयं व्रज के अधीश्वर भगवान्‌ श्रीकृष्ण का ही यह हाल हो जाता है, तब फिर उस पुण्यभूमि की रही-सही नैसर्गिक छटा के दर्शन के लिए, उस छटा के लिए जिसकी एक झाँकी उस पुनीत युग का, उस जगद् गुरु का, उसकी लौकिक रूप में की गई अलौकिक लीलाओं का अद्भुत प्रकार से स्मरण कराती, अनुभव का आनंद देती और मलिन मन-मंदिर को सर्वथा स्वच्छ करने में सहायता प्रदान करती है, भावुक भक्त तरसा करते हैं। इसमें आश्चर्य ही क्या है?

नैसर्गिक शोभा न भी होती, प्राचीन लीलाचिह्न भी न मिलते होते तो भी केवल साक्षात्‌ परब्रह्म का यहाँ विग्रह होने के नाते ही यह स्थान आज हमारे लिए तीर्थ था, यह भूमि हमारे लिए तीर्थ थी, जहाँ की पावन रज को ब्रह्मज्ञ उद्धव ने अपने मस्तक पर धारण किया था, वह व्रजवासी भी दर्शनीय थे, जिनके पूर्वजों के भाग्य की साराहना करते-करते भक्त सूरदास के शब्दों में बड़े-बड़े देवता आकर उनकी जूठन खाते थे, क्योंकि उनके बीच में भगवान अवतरित हुए थे।

व्रज-वासी-पटतर कोउ नाहिं।
ब्रह्म सनक सिव ध्यान न पावत, इनकी जूठनि लै लै खाहिं॥
हलधर कह्यौ, छाक जेंवत संग, मीठो लगत सराहत जाहिं।
'सूरदास' प्रभु जो विश्वम्भर, सो ग्वालन के कौर अघाहिं

तब फिर यहाँ तो अनन्त दर्शनीय स्थान हैं, अनन्त सुंदर मठ-मंदिर, वन-उपवन, सर-सरोवर हैं, जो अपनी शोभा के लिए दर्शनीय हैं और पावनता के लिए भी दर्शनीय हैं। सबके साथ अपना-अपना इतिहास है। यद्यपि मुसलमानों के आक्रमण पर आक्रमण होने से व्रज की सम्पदा नष्ट प्राय हो गई है।

कई प्रसिद्ध स्थानों का चिह्न तक मिट गया है, मंदिरों के स्थान पर मस्जिदें खड़ी हैं, तथापि धर्मप्राण जनों की चेष्टा से कुछ स्थानों की रक्षा तथा जीर्णोद्धार होने से वहाँ की जो आज शोभा है, वह भी दर्शनीय ही है।
<< 1 | 2 
और भी
जैन सिद्धोदय सिद्ध क्षेत्र
खड़ोतिया का जैन तीर्थ
सिद्धवट
कालभैरव
कुछ खास धार्मिक स्थल
श्री ह‍रसिद्धी देवी