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भगवान्‌ श्रीकृष्ण की व्रजभूमि
Devendra SharmaND
भगवान्‌ श्रीकृष्ण धन्य हैं, उनकी लीलाएँ धन्य हैं और इसी प्रकार वह भूमि भी धन्य है, जहाँ वह त्रिभुवनपति मानस रूप में अवतरित हुए और जहाँ उन्होंने वे परम पुनीत अनुपम अलौकिक लीलाएँ कीं। जिनकी एक-एक झाँकी की नकल तक भावुक हृदयों को अलौकिक आनंद देने वाली है।

श्रीकृष्ण को अवतरित हुए आज पाँच सहस्र वर्ष से ऊपर हुए, परन्तु उनके कीर्तिगान के साथ-साथ उस परम पावन भूखण्ड की भी महिमा का सर्वदा बखान किया जाता है, जहाँ की रज को मस्तक पर धारण करने के लिए अब तक लोग तरसते हैं। बड़े-बड़े लक्ष्मी के लाल अपने समस्त सुख-सौभाग्य को लात मार यहाँ आ बसे और व्रज के टूक माँग कर उदरपोषण करने में ही उन्होंने अपने आपको धन्य समझा। यही नहीं, अनेक भक्त हृदय तो वहाँ के टुकड़ों के लिए तरसा करते हैं। भगवान्‌ से इसके लिए वे प्रार्थना करते हैं। ओड़छे के व्यास बाबा गिड़गिड़ाकर कहते हैं-

ऐसो कब करिहौ मन मेरो।
कर करवा हरवा गुंजन कौ कुंजन माहिं बसेरो॥
भूख लगै तब मांगि खाउंगो, गिनौं न सांझ सबेरो।
ब्रज-बासिन के टूक जूंठ अरु घर-घर छाछ महेरो

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यह क्या बात है? इस भूमि में ऐसा कौन सा आकर्षण है, जो अपनी ओर आकर्षित कर लेता है? भगवान्‌ श्रीकृष्ण ने यहाँ जन्म धारण किया था और नाना प्रकार की अलौकिक लीलाएँ की थीं, क्या इसीलिए भक्त हृदय इससे इतना प्रेम करते हैं? हाँ, अवश्य ही यह बात है पर केवल यही बात नहीं है, इसके साथ-साथ सोने में सुगंध यह और है कि इस भूमि को भी भगवान्‌ श्रीकृष्ण गो लोक से यहाँ लाए थे।

जैसे भगवान्‌ के साथ-साथ देवी-देवता, ऋषि-मुनि, श्रुतियाँ आदि ने आकर गोप-गोपिकाओं का जन्म ग्रहण किया था। उसी प्रकार व्रज भूमि भी श्री गोकुलधाम से उनके साथ ही आई थी, इस कारण इसकी महिमा विशेष है। पुराणों के अनुसार यह भूमि सृष्टि और प्रलय की व्यवस्था से बाहर है। ऋग्वेद में एक ऋचा व्रज के संबंध में मिलती है, जो इस प्रकार है-

ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिश्रृंगा अयासः
अत्राह तदुरुगायस्य वृष्णेः परमं पदमवभाति भूरि

ता तानि वां युवयो रामकृष्णयोर्वास्तूनि निरम्य स्थानानि गमध्यै गन्तुम्‌ उश्मसि उष्मः कामयामहे न तु तत्र गन्तुं प्रभवामः। यत्र (वृन्दावनेषु) वास्तुषु भूरिश्रृंगा गावः अयासः संचरन्ति अत्र भूलोके अह निश्चितं तत्‌ गोलोकाख्यं परमं पदं भूरि अत्यन्तं मुख्यम्‌ उरुभिर्बहुभिर्गीयते स्तूयत इत्युरुगायस्तस्य वृष्णेर्यादवस्य पदमवभाति प्रकाशते इति

अर्थात्‌ इंद्र स्तुति करते हैं कि 'हे भगवन्‌ श्री बलराम और श्रीकृष्ण! आपके वे अति रमणीक स्थान हैं। उनमें हम जाने की इच्छा करते हैं पर जा नहीं सकते। (कारण, 'अहो मधुपुरी धन्या वैकुण्ठाच्च गरीयसी। विना कृष्ण प्रसादेन क्षणमेकं न तिष्ठति॥' यानी यह मधुपुरी धन्य और वैकुण्ठ से भी श्रेष्ठ है, क्योंकि वैकुण्ठ में तो मनुष्य अपने पुरुषार्थ से पहुँच सकता है पर यहाँ श्रीकृष्ण की आज्ञा के बिना कोई एक क्षण भी नहीं ठहर सकता)। यदुकुल में अवतार लेने वाले, उरुगाय (यानी बहुत प्रकार से गाए जाने वाले) भगवान्‌ वृष्णि का गोलोक नामक वह परम पद (व्रज) निश्चित ही भू-लोक में प्रकाशित हो रहा है।
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