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पार्श्वगिरि तीर्थ
शनि की शांति के लिए आते हैं पार्श्वगिरि...
- दीपक व्या

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प्रसिद्ध दिगंबर जैन सिद्धक्षेत्र बावनगजा के समीप एक और तीर्थ आकार ले रहा है- पार्श्वगिरि तीर्थ। सतपु़ड़ा की सुरम्य पहा़डि़यों के बीच बसा पार्श्वगिरि का नवग्रह मंदिर जैन धर्मावलंबियों की आस्था की प्रतीक है। वहीं अद्भुत प्राकृतिक नजारों के कारण यह तीर्थ धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में ख्याति प्राप्त कर रहा है।

ब़ड़वानी से दूरी चार किमी
बावनगजा मार्ग पर ब़ड़वानी से 4 किलोमीटर दूर जाने पर बाईं ओर एक रास्ता मु़ड़ता है। यहाँ से कुछ दूर चलने पर पहा़ड़ी पर दूर से ही पार्श्वगिरि का मंदिर दिखाई देता है।

पहा़ड़ी पर पहुँचते ही सर्वप्रथम आता है नवग्रह मंदिर। इस मंदिर के मध्य में भगवान मुनि सुव्रतनाथ की मूर्ति स्थापित है। शनि की शांति के लिए इनकी आराधना करने श्रद्धालु दूर-दूर से आते हैं। कई लोगों ने यहाँ आकर अपने दारुण दुःखों से मुक्ति पाई है।
  सतपु़ड़ा की पहा़डि़याँ प्रकृति की अद्भुत छटा को अपनी गोद में समेटे हुए हैं। पार्श्वगिरि तीर्थ के नवग्रह मंदिर से ख़ड़े होकर हम चारों ओर प्रकृति के विविध स्वरूपों को निहारकर आश्चर्यचकित हो सकते हैं।      


मात्र 19 दिन में हो गया निर्माण
पार्श्वगिरि ट्रस्ट के अध्यक्ष ओमप्रकाश जैन के मुताबिक सतपु़ड़ा की पहाडि़योको काटकर बनाया गया यह मंदिर मात्र 19 दिनों में बनकर तैयार हो गया। वर्ष 2001 में आचार्यश्री सन्मतिसागरजी की प्रेरणा से राजकुमार जैन (देवास) ने इसे निर्मित कराया था। इस मंदिर में स्थापित प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा आचार्यश्री सन्मतिसागरजी ने ही की थी।

ऊपर स्थित है प्राचीन प्रतिमा
नवग्रह मंदिर से 50 सीढि़याँ ऊपर चढ़ने के बाद हमें भगवान पार्श्वनाथ की चतुर्थकालीन पाषाण प्रतिमा के दर्शन होते हैं। यह मुख्य प्रतिमा मंदिर के प्रांगण में प्राचीन कस्तार वृक्ष के नीचे स्थापित है।

इस दिव्य वृक्ष की छाल से कई गंभीर रोग (जो़ड़ों का दर्द, अस्थमा, नेत्र व उदर रोग आदि ) ठीक हो जाते हैं। इस प्रतिमा का जीर्णोद्धार कार्य सन्‌ 1999 में आरंभ किया गया।

अष्टकोणीय है मुख्य मंदिर
यहीं प्राचीन प्रतिमा के समीप पंच बालयति का मंदिर है, जो सन्‌ 2001 में बनकर तैयार हुआ है। इस मंदिर की विशेषता है कि यह अष्टकोणीय है। इस मंदिर के प्रत्येक कोण पर 8 कोने बने हुए हैं, जो शिल्पकारी का उत्कृष्ट नमूना हैं।
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