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बारह ज्‍योतिर्लिंग
महाकालेश्‍व
उज्‍जैन (मध्‍यप्रदेश) स्थित महाकालेश्‍वर ज्‍योतिर्लिंग एकमात्र दक्षिणमुखी ज्‍योतिर्लिंग है। इसलिए इस ज्‍योतिर्लिंग का पौराणिक और तांत्रिक महत्‍व सबसे ज्‍यादा है। यह ज्‍योतिर्लिंग भी स्‍वयंभू है। महाकाल ज्‍योतिर्लिंग के सच्‍चे मन से दर्शन करने वाले भक्‍तों को अभय दान मिलता है। महाकाल के भक्‍तों को मृत्‍यु और बीमारी से भय नहीं लगता है। दरअसल महाकाल ज्‍योतिर्लिंग को देवता के साथ-साथ उज्‍जैन के राजा के रूप में भी पूजा जाता है। इसके उद्भव की कथा में ही इसे अवंतिका (उज्‍जैन) के राजा के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।

अवंतिका के राजा वृषभसेन भगवान शिव के अनन्‍य भक्‍त थे। उनका पूरा समय शिवभक्ति में बीतता था। एक बार वृषभसेन के पड़ोसी राज्‍य के राजा ने अवंतिका पर हमला कर दिया। वृषभसेन की सेना ने उसके हमले को निष्‍फल कर दिया। तब आक्रमणकारी राजा ने एक असुर दुशान की मदद ली, जिसे अदृश्‍य होने का वरदान प्राप्‍त था। दुशान ने अवंतिका पर खूब कहर बरपाया। ऐसे समय अवंतिका के लोगों ने भगवान शिव को पुकारा। भगवान शिव वहाँ साक्षात् प्रकट हुए और उन्‍होंने अवंतिका की प्रजा की रक्षा की। इसके बाद राजा वृषभसेन ने भगवान शिव से अवंतिका में बसने और अवंतिका का प्रमुख बनने की विनती की। राजा की प्रार्थना सुनकर भगवान वहाँ ज्‍योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए। भगवान महाकाल को आज भी उज्‍जैन का शासक ही माना जाता है।

मल्लिकार्जु
आंध्रप्रदेश के कुर्नुर जिले में कृष्‍णा नदी के किनारे पर मल्लिकार्जुन मंदिर में 'श्रीसेलम' ज्‍योतिर्लिंग स्थित है। स्‍कंद पुराण में एक पूरा अध्‍याय' श्रीसेलाकंदम' इस ज्‍योतिर्लिंग की महिमा का वर्णन करता है। मल्लिकार्जुन मंदिर के बारे में एक प्राचीन कथा है, जिसके अनुसार शिवगण नंदी ने यहाँ तपस्‍या की थी। उनकी तपस्‍या से प्रसन्‍न होकर भगवान शंकर और देवी पार्वती ने उन्‍हें मल्लिकार्जुन और ब्रहृमारंभा के रूप में दर्शन दिए थे। इस ज्‍योतिर्लिंग का वर्णन महाभारत में भी है। पाण्‍डवों ने पंचपाण्‍डव लिंगों की स्‍थापना यहाँ पर की थी। भगवान राम ने भी इस मंदिर के दर्शन किए थे। भक्‍त प्रहलाद का पिता राक्षसराज हिरण्‍यकश्‍यप भी यहाँ पर पूजा अर्चना करता था।
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