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बारह ज्‍योतिर्लिंग
- नूपुदीक्षि

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ज्‍योतिर्लिंग अर्थात ज्‍योति का बिंदु। भगवान शंकर 12 स्‍थानों पर स्‍वयंभू शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए हैं। इन बारह स्‍थानों को ज्‍योतिर्लिंग की संज्ञा दी गई हैं।

यह बारह ज्‍योतिर्लिंग हैं। सोमनाथ, नागेश्‍वर, महाकाल, मल्लिकार्जुन, भीमशंकर, ओंकारेश्‍वर, केदारनाथ, विश्‍वनाथ, त्र्यंबकेश्‍वर, घृष्‍णेश्‍वर, रामेश्‍वर, बैद्यनाथ।

सोमना
सौराष्‍ट्र (गुजरात) स्थित यह सबसे प्राचीन व महत्‍वपूर्ण ज्‍योतिर्लिंग हैं। इस ज्‍योतिर्लिंग का वर्णन ऋग्‍वेद् में भी है। सोमनाथ मंदिर के बारे में कहा जाता है कि सबसे पहले इस मंदिर का निर्माण चंद्रदेव ने स्‍वर्ण से करवाया था, उसके पश्‍चात् रावण ने चाँदी से इस मंदिर का निर्माण करवाया। रावण के बाद भगवान श्रीकृष्‍ण ने चंदन की लकडि़यों से इस मंदिर को बनवाया और उनके बाद सोल‍ंकी वंश के राजा भीमदेव ने पत्‍थर से इस मंदिर का निर्माण करवाया था।

सोमनाथ के मंदिर पर छह बार आक्रमणकारियों ने हमला किया है। हर बार इस मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया गया। मंदिर के वर्तमान भवन और परिसर का निर्माण श्री सोमनाथ ट्रस्‍ट ने करवाया है। इसे सन् 1995 में राष्‍ट्र को समर्पित किया गया था। सोमनाथ का मंदिर इस बात का प्रतीक की सृजनकर्ता की शक्ति हमेशा विनाशकर्ता से अधिक होती हैं।

नागेश्‍वर
द्वारका स्थित नागेश्‍वर ज्‍योतिर्लिंग के उद्भव की कथा भी बहुत रोचक है। शिवपुराण में इस ज्‍योतिर्लिंग की कथा का वर्णन है। दारूका नामक एक राक्षस ने एक निरपराध शिवभक्‍त सुप्रिया को कारावास में कैद कर दिया था।

निर्दोष सुप्रिया ने अपनी रक्षा के लिए ॐ नम: शिवाय मंत्र का जाप किया। उसने जेल में अन्‍य कैदियों को भी मंत्र का जाप करना सिखा दिया। उन सब की भक्तिभाव से परिपूर्ण पुकार सुनकर भगवान शिव वहाँ पर प्रकट हुए और उन्‍होंने दारूका नामक दैत्‍य का वध किया। उसके पश्‍चात् वे ज्‍योतिर्लिंग के रूप में वहीं पर निवास करने लगे।
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