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दोष न देखो
सुदस्सं वज्जमञ्जेसं उत्तनो पन दुइसं।
परेसं हि सो वज्जानि ओपुनाति यथा भुसं।
अत्तनो पन छादेति कलि व कितवा सठी॥

भगवान बुद्ध कहते हैं कि दूसरे का दोष देखना आसान है, अपना दोष देखना कठिन। मनुष्य दूसरों के दोषों को भुस की तरह फैलाता है। और अपने दोषों को ऐसे छिपाता है जैसे जुआरी पासों को।

परवज्जानुपस्सिस्स निच्चं उज्झानसञ्जिनो।
आसवा तस्य वड्ढन्ति आरा सो असावक्खया॥

जो आदमी दूसरों के दोष देखता रहता है और नित्य दूसरों से खीजता रहता है, उसके चित्त के मल बढ़ जाते हैं। उसके मन का मैल मिटाना कठिन है।
और भी
किसी को न सताओ