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किसी को न सताओ
सब्बे तप्तन्ति दंडस्स सब्बे भायन्ति मच्चुनो।
अत्तानं उपमं कत्वा न हनेय्य न घातये॥

भगवान बुद्ध कहते हैं कि दंड से सभी लोग डरते हैं। मृत्यु से सभी भय खाते हैं। दूसरों को अपने जैसा ही जानकर मनुष्य न तो किसी को मारे और न किसी को मारने की प्रेरणा करे।

सब्बे तप्तन्ति दंडस्स सब्बेसं जीवितं पियं।
अत्तानं उपमं कत्वा न हनेय्य न घातये॥

दंड से सभी लोग डरते हैं। जीवन सबको प्यारा लगता है। दूसरों को अपने जैसा मानकर मनुष्य न तो किसी को मारे, न किसी को मारने की प्रेरणा करे।

सुखकामानि भूतानि यो दंडेन विहिंसति।
अत्तनो सुखमेसानो पेच्च सो न लभते सुखं॥

जो मनुष्य अपने सुख की इच्छा करता है और सुख की इच्छा करने वाले दूसरे प्राणियों को सताता है, वह मरकर कभी सुख नहीं पाता।

न तेन अरियो होति येन पाणानि हिंसति।
अहिंसा सब्बपाणानं अरियो ति पवुच्चति॥

प्राणियों की हिंसा करने से कोई आर्य नहीं होता। जो किसी प्राणी की हिंसा नहीं करता, उसी को 'आर्य' कहा जाता है।

जग को जीतो प्यार से

अवकोच्छि मं अवधि मं जिनि मं अहासि मे।
ये च तं उपय्हन्ति वेरं तेसं न सम्मति॥

भगवान बुद्ध कहते हैं कि 'उसने मुझे गाली दी', 'उसने मुझे मारा', उसने मुझे हराया', 'उसने मुझे लूटा'- जो अपने मन में इस तरह की बातों की गाँठ बाँधे रहते हैं, उनका बैर कभी शांत नहीं होता।

अवकोच्छि मं अवधि मं अजिनि मं अहासि मे।
ये तन उपनय्हन्ति वेर तेसूपसम्मति॥

'उसने मुझे गाली दी, 'उसने मुझे मारा', 'उसने मुझे हराया' 'उसने मुझे लूटा', जो लोग अपने मन में इस तरह की बातों की गाँठ नहीं बाँधे रहते, उनका बैर शांत हो जाता है।

एक उदाहरण से यह बात और अच्छी तरह से स्पष्ट होती है- दो सौतें आपस में डाह करती थीं। कई जन्मों तक वे एक-दूसरे से बदला लेती रहीं। एक जनमी कन्या होकर, दूसरी काली यक्षिणी होकर। कन्या बड़ी हुई। शादी हुई। इसे जब-जब बच्चे होते तो यक्षिणी आकर उन्हें खा डालती। एक बार संयोग से जेतवन में भगवान बुद्ध विराजमान थे। पास में ही बैठी वह स्त्री अपने बच्चे को दूध पिला रही थी। तभी आ गई यक्षिणी। बच्चे को गोद में लिए हुए माँ दौड़ी भगवान के पास। उनके चरणों में बच्चे को डालकर बोली- 'भंते! इसे जीवनदान दीजिए।'

भगवान ने यक्षिणी को समझाकर उसका क्रोध शांत किया। उन्होंने कहा-

न हि वेरेन वेरानि सम्मन्तीघ कुदाचनं।
अवेरेन च सम्मन्ति एस धम्मो सनन्तनो॥

इस संसार में बैर से बैर कभी नहीं मिटता। बैर न करने से, मित्रता करने से बैर मिटता है- यही सनातन धर्म है। यही सदा का नियम है।

परदुक्खूपधानेन या अत्तनो सुखमिच्छति।
वेरसंसग्गसंसट्ठो वेरा सो न पमुच्चति॥

जो कोई दूसरे को दुःख देकर अपने लिए सुख चाहता है, वह बैर की लपेट में पड़ा जीव बैर से कभी नहीं छूटता।