- मनोहरसिंह मेहता 'प्रेम' हे पुष्कर के पुष्प सुगंधित, हे आत्म-आनंद के भंडार, हे महावीर के सुंदर मोती, श्रद्धा स्वर कर लो स्वीकार॥
महापुरुषों का जन्म इस संसार में अधिक-व्याधि और उपाधि से ग्रसित जनमानस को शांति-समाधि और आनंद की ओर ले जाने के लिए समय-समय पर इस धरा पर होता रहा है। आचार्य सम्राट पूज्य गुरुदेव श्री देवेन्द्रमुनिजी मसा श्रमण संघ के तृतीय पट्टधर थे। आपका जन्म धनतेरस के दिन झीलों की नगरी उदयपुर में हुआ।
माता का नाम तीजाबाई व पिता का नाम जीवनसिंह बरडिया था। माँ के ममत्व एवं बहन (साध्वी पुष्पवतीजी मसा) के प्यार ने आपको पुष्पित-पल्लवित करते हुए उच्चकोटि के धार्मिक संस्कारों का वहन किया। 9 वर्ष की लघु उम्र में 1 मार्च 1941 को खंडप में उपाध्याय पूज्य गुरुदेव श्री पुष्करमुनिजी मसा के सान्निध्य में दीक्षा ग्रहण कर ली। आप करुणा के देवता, क्षमा के अवतार थे। छोटे-बड़े सभी के प्रति अपनत्व, वात्सल्य और स्नेह-सौजन्य का भाव आपश्री के विमल मानस में लहराता था।
ऐसे महान परमादरणीय जैन धर्म दिवाकर पूज्य आचार्यश्रीजी का वर्ष 1998 का चातुर्मास इंदौर के लिए ऐतिहासिक व अविस्मरणीय बन गया। वर्षावास के चार महीनों में उन्होंने महावीर भवन और बाहर के विभिन्न उपनगरों में विचरण कर ज्ञान गंगा प्रवाहित की। अमृत बिंदुओं से भरा देवेन्द्र प्रवचनामृत संग्रह- 205 पन्नों के इस प्रवचन संग्रह में प्रवचनों को 115 खंडों में प्रस्तुत किया गया है। | | महापुरुषों का जन्म इस संसार में अधिक-व्याधि और उपाधि से ग्रसित जनमानस को शांति-समाधि और आनंद की ओर ले जाने के लिए समय-समय पर इस धरा पर होता रहा है। आचार्य सम्राट पूज्य गुरुदेव श्री देवेन्द्रमुनिजी मसा श्रमण संघ के तृतीय पट्टधर थे। |
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तकरीबन पाँच माह लंबे वर्षावास के दौरान सागर की गहराइयों के समान आचार्यश्री द्वारा दिए प्रवचनों का संकलन करना वास्तव में दुरूह कार्य है।
आचार्यश्री जीवन के उत्थान के लिए बड़े-बुजुर्गों और गुरु की सेवा को सर्वोपरि मानते हैं। उनका कहना है कि संभव है कदाचित अग्नि न जलाए, संभव है भयंकर विषधर सर्प कुपित होने पर भी न काटे और यह भी संभव है कि हलाहल विष भी न मारे, किंतु बड़ों का अपमान, निरादर करने वाला कभी जीवन में विकास नहीं करता है। जीवन के उत्थान के लिए बड़े-बुजुर्गों, माता-पिता और गुरु की विनय और सेवा करनी चाहिए।
आचार्यश्री देवेन्द्रमुनिजी मसा ने 26 अप्रैल 1999 को घाटकोपर (मुंबई) में अपनी भौतिक देह को त्यागा। सभी के स्वर गुरु विरह की वेदना से व्यथित थे और एक महापुरुष के आकस्मिक वियोग के साथ ही एक युगपुरुष का अभाव हो गया। उनके पावन श्रीचरणों में शत-शत नमन।
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