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मुनिश्री चौथमलजी महाराज
विचारों की निर्मलता से जीवन को सजाएँ
- हस्तीमल झेलावत

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भगवान महावीर की श्रमण परंपरा में जैन दिवाकर मुनिश्री चौथमलजी महाराज विलक्षण प्रतिभा संपन्न संत रत्न थे। उनके जीवन में वाणी और आचरण का अभूतपूर्व संगम था। वे पहले अपनी करनी देखते थे, फिर कथनी जीते थे। मुनिश्री वाणी के जादूगर थे। त्याग और समर्पण से युक्त उनका चारित्र तेजोमय था। सभी धर्मों के श्रद्धालुओं के मन में उनके प्रति गहरी श्रद्धा और आदर का भाव विद्यमान था। निष्कामता, निर्लोभता, अप्रमत्तता और अविचलता के गुणों के वे मूर्तिमंत प्रतीक थे।

मुनिश्री चौथमलजी महाराज का जन्म मालव भूमि के नीमच नगर में विसं 1934 कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी रविवार को गंगारामजी की धर्मशीला पत्नी श्रीमती केसरबाई की रत्नकुक्षी से हुआ। जन्म के पश्चात बालक का नाम चौथमल रखा गया। धर्म के संस्कार उन्हें अपने माता-पिता से विरासत में प्राप्त हुए। कुशाग्र बुद्धि होने से उन्होंने अल्प आयु में ही हिन्दी, गणित, उर्दू और संगीत का ज्ञान प्राप्त कर लिया।

अपने ज्येष्ठ भ्राता श्री कालूरामजी व पिताश्री की मृत्यु के पश्चात उनके मन में वैराग्य की भावना प्रबल होने लगी। आपका विवाह प्रतापगढ़ निवासी श्री पूनमचंदजी की सुपुत्री मानकुँवरबाई के साथ संपन्न हुआ। फिर भी वैराग्य पथ पर अग्रसर होने के दृढ़ निश्चय के फलस्वरूप बालक चौथमल ने विसं 1952 फाल्गुन शुक्ल तृतीया रविवार को बोलिया ग्राम में पूज्य श्री हीरालालजी महाराज के सुशिष्य के रूप में जैन भागवती दीक्षा ग्रहण कर भगवान महावीर के अहिंसा और करुणा के संदेश को जन-जन में प्रसारित करने का शुभ संकल्प किया।
भगवान महावीर की श्रमण परंपरा में जैन दिवाकर मुनिश्री चौथमलजी महाराज विलक्षण प्रतिभा संपन्न संत रत्न थे। उनके जीवन में वाणी और आचरण का अभूतपूर्व संगम था। वे पहले अपनी करनी देखते थे, फिर कथनी जीते थे। मुनिश्री वाणी के जादूगर थे।


जैन दिवाकरजी सच्चे अर्थों में समाज सुधारक संत थे। उनकी वाणी के प्रभाव से अनेक राजे-महाराजे, ठाकुर, जमींदार, भील-भिलाले सभी ने मांसाहार, शराब व शिकार करने का आजीवन त्याग किया। उन्हें अहिंसक व व्यसनमुक्त सात्विक जीवन जीने की प्रेरणा दी। मूक पशुओं की बलिन करने का संकल्प करवाकर लाखों पशुओं को अभयदान प्रदान किया।

उनके प्रवचन पीयूष से प्रभावित होकर अनेक वेश्याओं ने कलंकित जीवन को त्यागकर समाज में सम्मानजनक जीवन व्यतीत करने का संकल्प किया। सामाजिक जीवन में व्याप्त कुरीतियों और कुपरंपराओं को समाप्त कर जन-जन को आचार की उत्कृष्टता, विचारों की निर्मलता और नैतिकता से जीवन को सजाने की प्रेरणा दी।

समाज के जीवन से अस्पृश्यता निवारण, कन्या विक्रय व मृत्युभोज जैसी विकृतियों के निवारण की दिशा में उन्होंने अपनी वाणी से जनजागरण किया। 56 वर्ष के संयमी जीवन में उन्होंने संपूर्ण देश में पैदल भ्रमण करते हुए जन जीवन में अहिंसा का शंखनाद किया।
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