विद्याध्ययन की ओर उनका मन लगे इसलिए गदाधर को सत्रह वर्ष की उम्र में कलकत्ता (कोलकाता) भेजा गया। यहाँ पर आने के बाद गदाधर ने अपने मन में संकल्प कर लिया कि वे अपना जीवन केवल आध्यात्मिक ज्ञान की उपलब्धि में ही लगाएँगे। कुछ समय बाद ही वे दक्षिणेश्र्वर स्थित कालीमंदिर के पुजारी बन गए। उन्होंने अपनी इस नवीन जिम्मेदारी को आनंद और उत्साह के साथ निभाया।
धीरे-धीरे उनके भीतर माँ जगदम्बा के दर्शन करने की उत्कट कामना उत्पन्न हो गई। वे दिन-रात देवी की आराधना करते, ध्यान करते और देवी के दर्शन करने के लिए फूट-फूट कर रोते। वे बहुत कम भोजन करते और जरा भी नहीं सोते थे। अंतत: उन्हें देवी का दर्शन मिला।
इसके बाद वे कठोर आध्यात्मिक साधनाओं में लग गए। उन्होंने हिंदू धर्म के साथ इस्लाम धर्म और ईसाई धर्म के नियमों का पालन करते हुए, ईश्वर का साक्षात्कार किया। जिस दौरान श्री रामकृष्ण परमहंस इस आध्यात्मिक आनंद का अनुभव कर रहे थे। उसी दौरान उनके गाँव में यह बात फैल गई कि वे पागल हो चुके हैं। यह बात सुनकर उनकी माता ने उनका इलाज करवाने के लिए उन्हें वापस अपने गाँव बुला लिया।
स्वास्थ्य में सुधार होने के बाद उनका विवाह शारदा देवी के साथ सम्पन्न हुआ। श्री रामकृष्ण अपनी सहधर्मिणी को माँ जगदम्बा मानकर उनकी पूजा करते थे। उन दोनों का मिलन केवल आध्यात्मिक स्तर पर ही रहा। श्री रामकृष्ण ने शारदादेवी को गृहस्थी से लेकर ब्रहृमज्ञान तक सभी प्रकार से शिक्षित किया। श्री रामकृष्ण की तरह शारदादेवी भी आध्यात्मिकता के सर्वोच्च शिखर तक पहुँची। शारदादेवी को आज भक्तगण माँ शारदा कहकर पुकारते हैं।
श्री रामकृष्ण कहते थे रात्रि के समय तुम आकाश में अनेक नक्षत्र देखते हो, परंतु सूर्योदय होने पर नहीं देखते। तो क्या इसी कारण तुम कह सकते हो कि दिन के समय आकश में नक्षत्र नहीं होते? हे, मानव, चूँकि तुम अपनी अज्ञान अवस्था में भगवान को देख नहीं पाते, इसी कारण यह न कहो कि भगवान नहीं हैं। उनका महाप्रयाण 16 अगस्त, 1886 को हुआ। अपने भौतिक शरीर को त्यागने से पूर्व उन्होंने नवयुवकों के दल का गठन किया। इन नवयुवकों में सबसे गतिशील एवं प्रखर थे- स्वामी विवेकानंद। स्वामी विवेकानंद के नेतृत्व में इस दल ने भारत में और विदेशों में श्रीरामकृष्ण के संदेशों का प्रचार किया।
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