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कवि सूरदास
भावों की सूक्ष्म विविधता और अनेकरूपता तक उनकी सहज गति थी, यह सूरसागर के कृष्ण की लीलाओं के चित्रण को देखने से स्पष्ट हो जाता है। वात्सल्य और श्रृंगार के वे अद्वितीय कवि कहे जा सकते हैं। 'भ्रमरगीत' में गोपियों का विरह-वर्णन भी उन्होंने जिस तन्मयता के साथ किया है, वह दर्शनीय है। '

भागवत' से सूरसागर की तुलना करने पर ज्ञात होता है कि सूरदास ने 'भागवत' का अनुवाद न करके मौलिक रूप से कृष्ण की लीलाओं का चित्रण किया है और अनेक स्थानों पर ऐसी मौलिक उद्भावना भी प्रस्तुत की है जिसका आभास तक 'भागवत' में नहीं मिलता। 'निर्गुण' पर 'सगुण' की श्रेष्ठता ऐसी ही मौलिक उद्भावना है। कृष्ण के बाल-वर्णन और राधा-कृष्ण-प्रेम-निरूपण में भी ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं।

सूर की भाषा अत्यन्त परिष्कृत, समर्थ एवं भावानुकूल है। शैलीगत और छंदगत विविधता भी उनकी रचनाओं में पर्याप्त मात्रा में मिलती है। अलंकार चमत्कार का भी इतना समावेश है कि रीतिकवियों की रचनाएँ झूठी-सी जान पड़ती है। यह सूर की अपनी विशेषता है कि उन्होंने काव्य कौशल को भाव तत्व से ऊपर नहीं आने दिया। लगता है जैसे सारा काव्य-वैभव उनको अनायास ही उपलब्ध हो गया हो।

सूरदास रचित पाँच ग्रंथ माने जाते हैं। इनमें 'सूरसागर' ही सर्वप्रधान और श्रेष्ठ है। 'सूर सारावली' एक प्रकार से सूरसागर का सार अथवा विषय-सूची है। 'नल-दमयंती' और 'ब्याहलो' अप्राप्य हैं। सूरसागर आदर्श गीत-काव्य है और 'भागवत' के आधार पर लिखा गया है। वह 'भागवत' की तरह बारह स्कंधों में विभाजित है। जहाँ भागवत में 335 अध्यायों में केवल 90 अध्याय कृष्णावतार विषयक हैं, वहाँ सूरसागर में 4132 पदों में से 3642 पदों में कृष्ण-लीला का गान है।

अवशिष्ट रचना के अन्य अवतारों की कथा और प्रथम स्कन्ध में 219 विनय के पद हैं। 'भागवत' में कृष्ण की ब्रज-लीला के 49 अध्याय और द्वारिका-लीला के 41 अध्याय हैं। पर सूरसागर में गोकुल और मथुरा की लीला के 3494 पद हैं और उत्तरकालीन लीला से संबंधित 138 पद।

सूरदास ने ब्रजमंडल के लोकगीतों, संगीतज्ञों के शास्त्रीय पदों की और विद्यापति आदि के साहित्यिक गीतों की परंपराओं का ऐसा समन्वित विकास प्रस्तुत किया कि उसका प्रौढ़ रूप तथा सौंदर्य दर्शनीय हो उठा। सूरसागर राग-रागिनियों का अक्षय भंडार है, कृष्ण लीला का सुंदर कीर्तन है और सूरदास की पुष्टिमार्गीय भक्ति का आत्मोद्गार भी।

यह ब्रज भाषा की प्रथम साहित्यिक कृति है। ब्रज भाषा में इतनी बड़ी रचना पहले नहीं लिखी गई। अतएव इसकी लालित्यपूर्ण सजीव पद-योजना तथा भाषा की प्रांजलता और प्रौढ़ता विस्मयकारिणी है।

सूरदास बड़े भावुक भक्त थे। उनकी आत्मानुभूति की ही यह विशेषता है कि इतिवृत्तात्मक पद्धति को अपनाने पर भी उच्चकोटि की गीतिमत्तासे उनका काव्य वियुक्त नहीं हुआ। 'सूरसागर'उनकी साहित्यिक निपुणता तथा प्रकृति के सौंदर्य और मानव हृदय की गहराइयों के पर्यवेक्षण का प्रतिफल है।
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