हिन्दी के अनन्यतम और ब्रजभाषा के आदि कवि सूरदास का जन्म जनश्रुति के आधार पर दिल्ली के समीपस्थ सीही नामक ग्राम में माना जाता है।
वल्लभ सम्प्रदाय में, जिससे सूरदास सम्बद्ध रहे हैं, यह माना जाता है कि वे अपने गुरु श्री वल्लभाचार्य से केवल दस दिन छोटे थे। इस मान्यता से उनका जन्म संवत् 1565 (सन् 1478 ई.) स्थिर किया जाता है। गऊघाट में गुरुदीक्षा प्राप्त करने के पश्चात सूरदास ने 'भागवत' के आधार पर कृष्ण की लीलाओं का गायन करना प्रारंभ कर दिया। इससे पूर्व वे केवल दैन्य भाव से विनय के पद रचा करते थे। उनके पदों की संख्या 'सहस्राधिक' कही जाती है जिनका संग्रहीत रूप 'सूरसागर' के नाम से विख्यात है।
कहा जाता है कि वे जन्मांध थे किन्तु उनकी कविता में प्रकृति तथा दृश्य जगत की अन्य वस्तुओं का इतना सूक्ष्म और अनुभवपूर्ण चित्रण मिलता है कि उनके जन्मांध होने पर विश्वास नहीं होता। इसी तरह उन्हें सारस्वत ब्राह्मण बताया जाता है। पर उनकी रचनाओं में जो जातिगत उल्लेख मिलते हैं, वे संदेह उत्पन्न करते हैं।
सूरदास की तथाकथित रचना 'साहित्य लहरी' के एक पद में उन्हें चंदबरदायी का वंशज माना गया है और उनका वास्तविक नाम सूरजचंद बताया गया है। इस पद की प्रामाणिकता भी संदिग्ध है। वल्लभाचार्यजी के पुत्र श्री विट्ठलनाथजी ने सूरदास को आठ कवियों के समुच्चय 'अष्टछाप' में स्थान दिया था और वे उसके सर्वोत्कृष्ट कवि सिद्ध हुए।
पुष्टिमार्ग की उपासना और सेवा-प्रणाली का अनुसरण करते हुए सूरदास ने जीवनपर्यन्त पद-रचना की। मीरा, विद्यापति, चंडीदास आदि भारतीय साहित्य के अनेक कवियों ने पद-रचना की परंतु गीतिकाव्य में सूरदास का स्थान सर्वोच्च कहा जा सकता है। उनकी कविता अत्यंत लोकप्रिय हुई और उसे साहित्यिक सम्मान भी अद्वितीय रूप में मिला। 'सूर सूर तुलसी ससी' वाली लोक उक्ति इसका ज्वलंत प्रमाण है।
सूर की काव्य प्रतिभा ने तत्कालीन शासक अकबर को भी आकृष्ट किया था और उसने उनसे आग्रहपूर्वक भेंट की थी जिसका उल्लेख प्राचीन साहित्य में मिलता है। इसी प्रकार तुलसीदास से भी सूरदास की भेंट का वर्णन प्राप्त होता है जो सर्वथा संभव है। सूर का निधन काल निश्चित रूप से तो ज्ञात नहीं परन्तु अनुमानतः सौ वर्ष से अधिक की उम्र पाकर वे सं. 1630-35 वि. (सन् 1573-78) ई. के लगभग पारसोली ग्राम में दिवंगत हुए थे।
हृदय को स्पर्श कर सकने की प्रबल शक्ति सूर के पदों में मिलती है और यही उनकी कविता की सबसे बड़ी विशेषता है। स्नेह, वात्सल्य, ममता और प्रेम के जितने भी रूप मानवीय जीवन में मिलते हैं, लगभग सभी का समावेश किसी न किसी रूप में सूरसागर में प्राप्त हो जाता है। सागर की तरह विस्तार और गहराई दोनों ही विशेषताएँ सूर के काव्य में मिलती हैं। अतः उनकी रचना के साथ यह नाम उचित रूप से ही संबद्ध हुआ है।
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