स्वामी विरजानन्दजी की पूण्यकीर्ति सुनकर उनके दर्शन करने की और उनसे आर्ष ग्रंथों का अभ्यास, वैदिक अमृत का पान करने की तीव्र जिज्ञासा स्वामी दयानन्द के अंदर जाग उठी।
वे मथुरा में स्थित दण्डी स्वामी विरजानन्दजी की कुटिया पर पहुँचे। दण्डीजी का सामान्य नियम था कि पढ़ाने के अतिरिक्त समय में वे अपना द्वार बंद रखते थे। केवल दर्शनार्थियों से मिलना उन्हें पसंद न था।
दयानन्द ने धीरे से दरवाजा खटखटाया। अंदर से प्रश्न हुआ- 'कौन है?' 'मैं कौन हूँ यही जानने के लिए आपकी शरण में आया हूँ।' -दयानन्द ने विनयपूर्वक कहा।
'क्या कुछ पढ़े भी हो?' दयानन्द ने जो कुछ पढ़ा था वह सब कह सुनाया फिर भी दरवाजा न खुला।
भीतर से आवाज आई। 'आज तक जो कुछ तुमने पढ़ा है वह सब भुला दो। जब तक मनुष्य प्रणीत ग्रंथों का प्रभाव तुम्हारे हृदय पटल पर रहेगा तब तक तुम्हारे चित्त में आर्ष ग्रंथों का प्रभाव प्रवेश न कर सकेगा।
यदि तुम्हारे पास ऐसे ग्रंथ हों तो उन्हें भी यमुना में डाल आओ।'
पढ़ी हुई विद्या को फेंकना कितना दुष्कर है। किन्तु दयानन्द विलक्षण पुरुष थे। अपनी सभी पुस्तकें उन्होंने यमुना में डाल दीं और पुराने पढ़े को विस्मृत कर हृदय पटल को स्वच्छ कर दिया।
गुरुदेव की कुटिया का दरवाजा खुल गया। उन्हीं के कृपा प्रसाद से स्वामी दयानन्द ने हिंदूजाति को आडम्बर और भ्रमजाल से निकाला तथा वेदों के ज्ञान को नए सिरे से प्रकाशित किया।
धन्य है गुरुचरणों में अपनी मान्यताएँ अर्पण कर देने वाले ऐसे शिष्यों को!
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