जरथुस्त्र का मानना है कि सुख का स्रोत मनुष्य के भीतर ही है। सबसे ज्यादा सुखी वह है जो दूसरों को सुखी करता है। धन सुख का पर्याय नहीं है। धनी लोग केवल इसलिए सुखी नहीं हो सकते कि उनके पास धन है। साथ ही, धन किसी को महान नहीं बनाता, जरूरतमंदों के लिए उसका उपयोग व्यक्ति को महान बनाता है।
वे कहते हैं कि ईश्वर की इच्छा यह है कि मनुष्य अज्ञान, रोग और पाप से लड़े। मनुष्य का मनुष्य से लड़ना विक्षिप्तता है। युद्ध मानव द्वारा मानव पर किया जाने वाला सबसे बड़ा अपराध है।
जीवन को सार्थकतापूर्ण तरीके से जीने के लिए अच्छा स्वास्थ्य बेहद जरूरी है। अतः अपने स्वास्थ्य की रक्षा करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है।
जरथुस्त्र कहते हैं, 'अच्छे विचार विकसित करने के लिए स्वच्छ हवा में साँस लो, स्वच्छ पानी पीओ और स्वच्छ, पौष्टिक भोजन का सेवन करो। नशीले पदार्थों से दूर रहो। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए व्यायाम जरूरी है। स्वास्थ्य के लिए काश्तकारी सर्वोत्तम है क्योंकि यह व्यक्ति को प्रकृति के निकट रखती है।'
उनका मानना है कि मनुष्य श्रम करके समृद्धि प्राप्त करने हेतु जन्मा है, आराम करके जंग खाने के लिए नहीं। अतः जो भी काम करो उसमें पूरी तरह डूब जाओ। श्रम के पदचिह्नों पर चलकर ही समृद्धि आती है।
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