कुंदकुंद ज्ञानपीठ में श्रुतपंचमी महोत्सव के अंतर्गत रविवार से दुर्लभ पांडुलिपियों की प्रदर्शनी शुरू हो गई। इस मौके पर 'इक्कीसवीं सदी एवं जैन साहित्य' विषय पर एक संगोष्ठी भी आयोजित की गई है।
ज्ञानपीठ के मानद सचिव डॉ. अनुपम जैन ने बताया कि राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन, नई दिल्ली द्वारा 2003 में कुंदकुंद ज्ञानपीठ को पांडुलिपि स्त्रोत केंद्र के रूप में स्थापित किए जाने के बाद से अब तक 550 दुर्लभ पांडुलिपियाँ संग्रहीत की जा चुकी हैं। 1002 पांडुलिपियाँ उदासीन आश्रम के ग्रंथालय में हैं। इनमें सबसे प्राचीन पांडुलिपि 550 साल पुरानी है। | | कुंदकुंद ज्ञानपीठ में श्रुतपंचमी महोत्सव के अंतर्गत रविवार से दुर्लभ पांडुलिपियों की प्रदर्शनी शुरू हो गई। इस मौके पर 'इक्कीसवीं सदी एवं जैन साहित्य' विषय पर एक संगोष्ठी भी आयोजित की गई है। |
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'मुहूर्त मार्तंड' नामक यह ग्रंथ ज्योतिष विज्ञान का है। यहाँ केवल जैन धर्म की पांडुलिपियाँ ही संरक्षित नहीं की जा रही हैं। चमोली (उत्तरांचल) से हमें 150 पांडुलिपियाँ प्राप्त हुई हैं, जो 400 से 450 साल पुरानी हैं। इनमें गणित, ज्योतिष, आयुर्वेद एवं वास्तु विज्ञान से संबंधित ग्रंथ हैं। 'इक्कीसवीं सदी एवं जैन साहित्य' विषय पर आयोजित संगोष्ठी में समकालीन जैन साहित्य एवं उसकी उपादेयता पर विमर्श होगा।
जैन साहित्य का आधुनिक एवं वैज्ञानिक संरक्षण, अनुवाद एवं तार्किक टीकाएँ, मल्टीमीडिया के माध्यम से प्रचार एवं प्रसार, किस तरह के साहित्य सृजन की जरूरत है आदि विषयों पर गहन चर्चा होगी।
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