श्री पारसमुनिजी ने जैन दिवाकर मुनिश्री चौथमलजी की दीक्षा जयंती पर आयोजित गुणानुवाद सभा में कहा कि चौथमलजी श्रमण संस्कृति के ज्योतिर्मय नक्षत्र थे। उनका व्यक्तित्व बहुआयामी था। दिवाकर की भाँति उन्होंने झोपड़ी से लेकर महलों तक अपने ज्ञान का प्रकाश फैलाया।
त्याग और संयम के मार्ग पर निर्बाध रूप से अग्रसर रहते हुए उन्होंने अपनी मधुर व ओजस्वी वाणी से जन-जन को अहिंसा व व्यसनमुक्ति का संदेश दिया। जो भी आत्मा त्याग के पथ को अपनाती है, वह संसार में अधिक समय तक परिभ्रमण नहीं करती। उनके जीवन आदर्शों से हम भी प्रेरणा ग्रहण करें।
श्री अभिनंदनमुनिजी ने कहा कि जैन दिवाकरजी ने धर्म और समाज के क्षेत्र में जनजागरण कर कुप्रथाओं को मिटाने का कार्य किया। जन-जन के प्रिय होने के कारण उन्हें जगतवल्लभ भी कहा जाता था।
महासती सूर्यकांताजी ने कहा कि जैन दिवाकरजी ने अपने दिव्य ज्ञान की आभा से जन-जन के जीवन को प्रकाशित किया और हिंसा का विरोध कर अहिंसा का प्रचार किया।
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