मुख्य पृष्ठ > धर्म-संसार > धर्म-दर्शन > जैन धर्म
सुझाव/प्रतिक्रियामित्र को भेजियेयह पेज प्रिंट करें
 
सामायिक सूत्र
नवम पाठ
णमोत्थु णं-प्रणिपात-सूत्र पा

णमोत्थु णं, अरिहंताणं, भगवंताणं ।1।
आइगराणं, तित्थयराणं, सयं-संबुद्धाणं ।2।
पुरिसुत्तणामं, पुरिस-सीहाणं, पुरिस-वर-
पुंडरियाणं, पुरिस-वर गंधहत्थीणं ।3।
लोगुत्तमाणं, लोगं-नाहाणं, लोग-हियाणं-
लोग-पईवाणं, लोग-पज्जोय-गराणं ।4।
अभय-दयाणं, चक्खु-दयाणं, मग्ग-दयाणं-
सरण दयाणं, जीव-दयाणं, बोहि-दयाणं ।5।
धम्मं-दयाणं, धम्म-देसयाणं, धम्म-नायगाणं-
धम्म-सारहीणं, धम्म-वर-चाउरंत-चक्कवट्टीणं ।6।
दीवो, ताणं, सरण-गइ-पइट्‍ठाणं, अपिडहय-
वरनाण-दंसण-धराणं, वियट्ट-छउमाणं ।7।
जिणाणं-जावयाणं, तिण्णाणं-तारयाणं,
बुद्धाणं-बोहयाणं, मुत्ताणं-मोयगाणं ।8।
सव्वन्नूणं-सव्वदरिसणं, सिव-मयल-मरुअ-
मणंत-मक्खय-मव्वाबाह-मपुणरावित्ति, सिद्धिगइ-
नामधेयं ठाणं संपत्ताणं,*नमो जिणाणं, जियभयाणं ।9।

* (दूसरे णमोत्थु णं में संपत्ताणं के स्थान पर संपाविउ कामाणं बोलें।)

अर्थ- प्रणिपात=प्रकृष्ट दीर्घ कालावधि बारम्बार नमन
1. नमस्कार हो, अरिहंत भगवंतों को, = तीर्थंकर को।
2. श्रुत धर्म की आदि करने वालों, चारित्र धर्मतीर्थ की स्थापना करने वालों और स्वयं ज्ञान=वैराग्य पाने वालों को।
3. पुरुषों में उत्तम, पुरुषों में सिंह सदृश, पुरुषों में श्रेष्ठ पुंडरीक कमल के समान, पुरुषों में श्रेष्ठ गंध हस्ती के समान।
4. लोक में उत्तम, लोक के नाथ, लोक के हितकर्ता, लोक में प्रदीप, लोक को धर्मरूप से प्रकाशित करने वालों को।
5. अभय दान देने वालों, ज्ञान-नेत्र के देने वालों को, धर्म मार्ग के देने वालों को, शरण देने वालों को, संयम जीवन देने वालों को और सम्यकत्व या वैराग्य देने वालों को।
6. धर्म के दाताओं, धर्म के उपदेशकों, धर्म के नायकों, धर्मरूपी रथ के सा‍रथियों, चार गति के अंत करने वाले धर्म चक्रवर्तियों को।
7. संसार-सागर में द्वीप के समान, भव में, शरणगति और आधाररूप, अप्रतिहत-किसी भी आवरण से नष्ट न होने वाले केवल ज्ञान और दर्शन के धारकों, घातिकर्मों से रहितों को।
8.स्वयं राग-द्वेष को जीतने वालों, अन्य को राग-द्वेष से जिताने वालों को, स्वयं संसार-सागर से तिरे हुओं, अन्य को तारने वालों को, स्वयं बु‍द्धों और दूसरों को बोध देने वालों को, स्वयं मुक्तों और दूसरों को कर्म से मुक्त करने वालों को।
9. सर्वज्ञों और सर्व दर्शियों को, शिव=निरुपद्रव, अचल, अरुज=रोग रहित और अनंत, अक्षय, अव्याबाध=बाधा पीड़ा से रहित और पुनरागमन से रहित सिद्धि-गति नाम वाले स्थान को प्राप्त अथवा प्राप्त करने की कामना वालों को। नमस्कार हो, भयों के जेता, जिन भगवन्तों को।

दसवाँ पाठ
सामायिक पारने का पाठ

एयस्स नवमस्स सामाइयवयस्स, पंच अइयारा जाणिजव्वा,
न समायरियव्वा, तंजहा, मणदुप्पणिहाणे, वयदुप्पणिहाणे,
कायदुप्पणिहाणे, सामाइयस्स सइ अकरणया,
सामाइयस्स अणवट्ठियस्स करणया, तस्स मिच्छा मि दुक्कडं!

सामाइय वयं, सम्मंकाएणं, न फासियं, नपालियं, न तीरियं,
न किट्टियं, न सोहियं, न आराहियंआणाए अणुपालियं न भवइ;
तस्स मिच्छा मि दुक्कडं!

अर्थ- पारना=पूर्ण पालन करके पार होने की क्रिया
(1) सामायिक में दस मन के, दस वचन के और बारह काया के, इन बत्तीस दोषों में से कोई भी दोष (जानते हुए अथवा नहीं जानते हुए भी) लगा हो, तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।
(2) सामायिक में स्त्री कथा (स्त्रियाँ यहाँ पुरुष कथा कहें) देशकथा, राजकथा और भक्त (भोजन) कथा में से कोई भी विकथा कही हो, ‍(सुनी हो अथवा चाही हो) तो तस्स मि दुक्कडं।
(3) सामायिक व्रत में अतिक्रम, व्यतिक्रम, अतिचार, अनाचार, जानता-अजानता अतिचार पाप दोष लगा हो, तो तस्स मिच्छा‍मि दुक्कडं।
(4) सामायिक में आहार संज्ञा, भय संज्ञा, मैथुन संज्ञा और परिग्रह संज्ञा में से किसी भी संज्ञा का सेवन किया हो, तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।
(5) सामायिक व्रत विधिपूर्वक लिया, विधि से ही परिपूर्ण किया, फिर भी विधि में कोई अविधि हुई हो, तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।
(6) सामायिक का पाठ बोलने में कामा, मात्रा, अनुस्वार, पद, अक्षर, ह्रस्व, दीर्घ, न्यूनाधिक विपरीत पढ़ने में आया हो, तो अर्हन्त, अनंत सिद्ध, केवली भगवान की साक्षी से तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।

अंत में पाँच बार नवकार मंत्र गिनना चाहिए

साभार- सामायिक सूत्र
<< 1 | 2 | 3 | 4 | 5 
और भी
सामायिक का महत्‍व, लाभ एवं विधि
चार गतियों पर विचार कर पाएँ मोक्ष प्राप्ति
णमोकार महामंत्र
भगवान आदिनाथ का सप्तरंगी अभिषेक
हजारों श्रद्धालु हुए नतमस्तक
भगवान आदिनाथ का तीसरा महामस्तकाभिषेक