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सातवाँ पाठ लोगस्स चतुर्विंशति-स्तव का पाठ
अरिहंते उज्जोयगरे, धम्म-तित्थयरे, जिणे। अरिहंते कित्तइस्सं, चउवीसं पि केवली ।1। उसभ-मजियं च वंदे, संभव-मभिणंदणं च, सुमइं च। पउमप्पहं सुपासं, जिणं च, चंदप्पहं वंदे ।2। सुविहिं च, पुप्फदंतं, सीयल-सिज्जंस-वासुपुज्जं च। विमल-मणंतं च जिणं, धम्मं संतिं च वंदामि ।3। कुंथुं अरं च मल्लिं, वंदे मुणिसुव्वयं, नमि-जिणं च। वंदामि रिट्ठनेमिं, पासं तह, वद्धमाणं च ।4। एवं मए अभित्थुआ, विहूय-रय-मला पहीण-जर-मरणा। चउवीसंपि जिणवरा, तित्थयरा मे पसीयंतु ।5। कित्तिय-वंदिय-महिया, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा। आरुग्ग-बोहिलाभं, समाहि-वर-मुत्तमं दिंतु ।6। चंदेसु निम्मलयरा, आइच्चेसु अहियं पयासयरा। सागर-वर-गंभीरा, सिद्धा, सिद्धिं मम दिसंतु ।7।
अर्थ- 1. लोक में प्रकाश करने वाले, धर्मतीर्थ के निर्माता, राग-द्वेष को जीतने वाले, इंद्रों के पूज्य, महान समर्थ, केवल-ज्ञानी चौबीसों तीर्थंकरों का कीर्तन=नाम स्मरण करूँगा। (प्रतिज्ञा गाथा) 2. ऋषभदेव और अजितनाथ स्वामी को वंदन करता हूँ। संभवनाथ, अभिनंदनजी और सुमतिनाथ, पद्मप्रभ, सुपार्श्वनाथ और राग-द्वेष के जीतने वाले चंद्रप्रभ को वंदन करता हूँ। (1 से 8 तीर्थंकर) 3. सुविधिनाथ-अपर नाम पुष्पदंतजी, शीतलनाथ, श्रेयांसनाथ और वासुपुज्यजी, विमलनाथ और राग-द्वेष के जीतने वाले अनंतनाथ, धर्मनाथ और शांतिनाथ को वंदन करता हूँ। (9 से 16 तीर्थंकर) 4. कुन्थुनाथ, अरनाथ और मल्लिनाथ, मुनिसुव्रतजी और राग-द्वेष को जीतने वाले नमिनाथ की स्तुति करता हूँ। अरिष्ट नेमिनाथ तथा पार्श्वनाथ और वर्धमान स्वामी को वंदन करता हूँ। (17 से 24 तीर्थंकर) 5. इस प्रकार जिनकी मैंने स्तुति की है, जो रज=बँधते हुए कर्म और मल=बँधे हुए कर्म से मुक्त हैं और जरा-मरण से सर्वथा रहित हैं, वे चौबीसों ही तीर्थंकर भगवंत, मुझ पर प्रसन्न हों। 6. जो लोक में कीर्तित, वंदित और पूजित हैं, वे लोक में उत्तम सिद्ध भगवंत मुझे आरोग्य=चारित्र लाभ, बोधिलाभ (विरतिरूप फलवाले ज्ञान का लाभ) और उत्तम समाधि रूप वर दें। 7. चंद्रों से भी अधिक निर्मल, सूर्यों से भी अधिक प्रकाश करने वाले, स्वयंभूरमण समुद्र से भी अधिक गंभीर, हे सिद्ध भगवंतो! मुझे सिद्धि पद प्रदान करें।
आठवाँ पाठ सामायिक लेने का पाठ
करेमि, भंते! सामाइयं, सावज्जं जोगं पच्चक्खामि। जावनियमं (जितनी सामायिक करना हो, उतनी संख्या बोलना) मुहुत्तं पज्जुवासामि। दुविहं-तिविहेणं, न करेमि, न कारवेमि, मणसा-वयसा-कायसा, तस्स भंते! पडिक्कामामि, निंदामि, गरिहामि, अप्पाणं वोसिरामि।
अर्थ- सामायिक प्रतिज्ञा- हे पूज्य (अर्हन्त सिद्ध केवली भगवंत, गुरुदेव आदि)! मैं (आपकी साक्षी से तथा निश्रा से) सामायिक करता हूँ।सावद्ययोग- (पाप से युक्त क्रिया) का प्रत्याख्यान=त्याग करता हूँ।जहाँ तक नियम है, वहाँ तक (एक या ...मुहूर्त तक) पर्युपासना- (नरवद्य योग-शुभ क्रिया का सेवन) करता हूँ। तीन योगों अर्थात मन, वचन और काया से दो करणों अर्थात स्वयं से पाप क्रिया को नहीं करता हूँ और दूसरों से नहीं करवाता हूँ।
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