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सामायिक सूत्र
पाँचवाँ पा
कार्योत्‍सर्ग प्रतिज्ञा का पा

तस्‍स उत्तरी-करणेणं, पायच्‍छित-करणेणं,
विसोहीकरणेणं, विसल्‍ली करणेण, पावाणं कम्‍माणं
णिग्‍घायणट्ठाए, ठामि काउस्‍सग्‍गं।
अण्‍णत्‍थ, ऊससिएणं, नीससिएणं, खासिएणं-छीएणं-
जंभाइएणं, उड्डूएणं, वायनिसग्‍गेणं, भमलिए-पित्तमुच्‍छाए,
सुमुमेहिं अंग-संचालेहिं-सुहुमेहिं खेल-संचालेहिं-सुहुमेहिं
दिट्ठी-संचालेहिं, एवमाइएहिंआगारेहिं-अभग्‍गो- अविराहिओ,
हुज्‍ज मे काउस्‍सग्‍गो, जाव अरिहंताणं भगवंताणं
नमोक्‍कारेणं न पारेमि, ताव कायं ‘ठाणेणं मोणेणं-
झाणेणं’ अप्‍पातणं वोसिरामि।

अर्थ- उस (पाप या आत्‍मा) की आलोचनादि के) बाद (समाप्‍ति या विशिष्‍टता) की क्रिया करने के द्वारा, विशेष शुद्ध करने के द्वारा और शल्‍य (मोक्षमार्ग के कण्‍टकों) से रहित करने के द्वारा पाप कर्मों का नाश करने के लिए कायोत्‍सर्ग (काया की चेष्‍टा का निरोध रूप से अनुष्‍ठान) करता हूँ- इन (आगे कहे जाने वाले आगारों) के सिवाय-1 श्‍वास लेने से, 2- श्‍वास छोड़ने से, 3- खाँसी से, 4- छींक से, 5- अबासी से, 6- डकार से, 7- अधोवायु के छोड़ने से, 8- चक्‍कर आने से, 9- पित्त के प्रकोप से मूर्छित होने से, 10- सूक्ष्‍म रूप में अंग-संचार से, 11- सूक्ष्‍म रूप से खेंकार के संचार से, 12- सूक्ष्‍म रूप से दृष्‍टि संचार से, इस प्रकार और भी 13- (अग्‍निप्रकोपादि) आगारों से मेरा कायोत्‍सर्ग अभग्‍न अविराधित (अदूषित) रहे। जब तक मैं अरिहंत भगवंतों को नमस्‍कार करके, कायोत्‍सर्ग न पारूँ, तब तक एक स्‍थिर आसन, मौन और धर्म को ध्‍यान के द्वारा अशुभ योग व्‍यापारों को हटाता हूँ।

छठा पा
ध्यान करने का पाठ

कायोत्सर्ग में आर्तध्यान-रौद्रध्यान, ध्यायें हों, धर्मध्यान-
शुक्लध्यान न ध्यायें हों, तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।
कायोत्सर्ग में मन, वचन, काया के योग अशुभ
प्रवर्ताएँ हों, तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।

अर्थ- कायोत्सर्ग में अशुभ ध्यान की लहर से, प्रशस्त ध्यान के न जमने से और अशुभ योग के प्रवाह से, वर्तमान में लगे दोष तथा आगे के लिए उनकी बनने वाली परंपराएँ नष्ट हो जाएँ।
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