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तीसरा पाठ देव गुरु धर्म सम्यकत्व का पाठ
अरिहंत मह देवो, जावज्जीव सुसाहुणो गुरुणो। जिण-पण्णत्तं तत्तं, इअ ‘सम्मत्तं’ मए गहिएं ।1।
गुरु गुण का पाठपंचिदिय संवरणो, तह नवविह बंभचेर-गुत्तिधरो। चउव्विह कसाय-मुक्को, इअ अट्ठारस गुणोहिं संजुत्तो ।2।
पंच महव्वय-जुत्तो, पंच-विहायार-पालण-समत्थो। पंच-समिओ तिगुत्तो, छत्तीस गुणो ‘गुरु’ मज्झ ।3।
अर्थ- जीवन भर अरिहंत भगवान मेरे देव, उत्तम साधु मेरे गुरु और जिन-प्रज्ञप्त-(जिनेश्वरों के द्वारा प्रतिपादित)
तत्व- (मेरा धर्म) तथा मेरा शास्त्र है। यह सम्यकत्व = (उत्तम श्रद्धान), मैंने ग्रहण धारण किया है।
पाँचों इंद्रियों के संवर तथा नव प्रकार की ब्रह्मचर्य-गुप्ति के धारक, चारों कषायों से मुक्त - (निर्ग्रन्थ) इन अठारह गुणों से युक्त, पाँच समितियों और तीन गुप्तियों से युक्त, (पहले अठारह के मिलकर) इन छत्तीस गुणों के धारक आचार्य मेरे ‘गुरु’ हैं।
चौथा पाठ ईर्यापथ आलोचना का पाठ
इच्छाकारेणं संदिस्सह, भगवं! इरियावहियं पडिक्कामि। इच्छं, इच्छामि पडिक्कमिउं, इरियावहियाए-विराहणाए। गमणागमणे, पाणक्कमणे, बीयक्कमण, हरियक्कमणे। ओसा-उत्तिंग-पणग-दग-मट्टी-मक्कडा-संताणां, संकमणे।
जे मे जीवा विराहिया,एगिंदिया, बेइंदिया, तेइंदिया, चउरिंदिया, पंचिंदिया। अभिहया, वत्तिया, लेसिया, संघाइया, संघट्टिया, परियाविया, किलमिया, उद्दविया, ठाणाओ ठाणं संकामिया, जीवियाओ ववरोविया, तस्स मिच्दा मि दुक्कडं।
अर्थ- (हे भगवन! (आपकी) इच्छा के अनुसार अनुज्ञा दीजिए। मैं (साधना) मार्ग में लगे हुए दोषों का प्रतिक्रमण-(संशोधन) करता हूँ। ‘जैसी इच्छा’।) मैं मार्ग में हुई विराधना का प्रतिक्रमण करना चाहता हूँ। जाने-आने में प्राणी, बीज और हरी को कुचला हो। ओस, कीड़ी-नगर, फूलन, कच्चे जल, सचित्त मिट्टी और मकड़ी के जाले का (प्रमाद से) संक्रमण- (उल्लंघन, उपमर्दन) किया हो। मैंने एकेंद्रीय, द्विन्द्रीय, त्रयन्द्रिय, चतुरिन्द्रीय और पंचेंद्रीय, जिन किन्हीं जीवों की विराधना की हो, (विराधना के प्रकार) (1) सन्मुख आए जीवों को हना हो- गतिरोध किया हो- (2) (धूल आदि से ढँके हो, (3) परस्पर मसले हों, (4) इकट्ठे किए हों, (5) परस्पर टकराए हों, (6) सताएँ हो, (7) क्लेश पहुँचाया हो, (8) अधघायल किया हो, (9) एक सुख स्थान से दूसरे दु:ख स्थान पर डाले हों और या (10) जीवन से विमुक्त कर दिए हों, तो मरे वे दुष्कृत= पाप निष्फल हों।
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