हा हा! मैं परमाद बसाई, बिन देखे अगनि जलाई। ता मधि जे जीव जु आये, ते हूँ परलोक सिधाये॥
बींध्यो अन राति पिसायो, ईंधन बिन सोधि जलायो। झाडू ले जागाँ बुहारी, चिवंटा आदिक जीव बिदारी॥
जल छानी जिवानी कीनी, सो हू पुनि डार जु दीनी। नहिं जल-थानक पहुँचाई, किरिया विन पाप उपाई॥
जल मल मोरिन गिरवायौ, कृमि-कुल बहु घात करायौ। नदियन बिच चीर धुवाये, कोसन के जीव मराये॥
अन्नादिक शोध कराई, तामे जु जीव निसराई। तिनका नहिं जतन कराया, गलियारे धूप डराया॥
पुनि द्रव्य कमावन काजै, बहु आरंभ हिंसा साजै। किये तिसनावश अघ भारी, करुना नहिं रंच विचारी॥
इत्यादिक पाप अनंता, हम कीने श्री भगवंता। संतति चिरकाल उपाई, बानी तैं कहिय न जाई॥
ताको जु उदय अब आयो, नानाविधि मोहि सतायो। फल भुँजत जिय दुख पावै, वचतै कैसे करि गावै॥
तुम जानत केवलज्ञानी, दुख दूर करो शिवथानी। हम तो तुम शरण लही है, जिन तारन विरद सही है॥
जो गाँवपति इक होवै, सो भी दुखिया दुख खोवै। तुम तीन भुवन के स्वामी, दुख मेटहु अंतरजामी॥
द्रोपदि को चीर बढ़ायो, सीताप्रति कमल रचायो। अंजन से किये अकामी, दुख मेटहु अंतरजामी।
मेरे अवगुन न चितारो, प्रभु अपनो विरद निम्हारो। सब दोषरहित करि स्वामी, दुख मेटहु अंतरजामी॥
इंद्रादिक पद नहिं चाहूँ, विषयनि में नाहिं लुभाऊँ। रागादिक दोष हरीजै, परमातम निज-पद दीजै॥
दोषरहित जिन देवजी, निजपद दीज्यो मोय। सब जीवन को सुख बढ़ै, आनंद मंगल होय॥
अनुभव मानिक पारखी, 'जौहरि' आप जिनंद। यही वर मोहि दीजिए, चरण-सरण आनंद।
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