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सुगंध दशमी व्रत का महात्‍म्‍य
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दिगंबर जैन कमान्‍यताओं में सुगंध दशमी व्रत का काफी महत्‍व है और स्त्रियाँ हर वर्ष इस व्रत को करती हैं। धार्मिक व्रत को विधिपूर्वक करने से अशुभ कर्मों का क्षय, शुभास्रव और पुण्‍यबंध होता है तथा स्‍वर्ग मोक्ष की प्राप्ति होती है।

सुगंध दशमी व्रत भी वैसा ही है। साथ ही सांसारिक दृष्टि से उत्‍तम शरीर प्राप्‍त होना भी इसका व्रतफल बताया गया है।

यह व्रत भाद्रपद शुक्‍ला दशमी को किया जाता है। इसे सुगंध दशमी के अलावा धूप दशमी भी कहा जाता है। इस दिन सभी जैन स्‍त्री व पुरुष मंदिरों में जाकर धूप देते हैं। इसलिए वायुमंडल बड़ा सुगंधमय व स्‍वच्‍छ हो जाता है।

व्रत का पूर्ण विधान तो भाद्रपद शुक्‍ल पंचमी से दशमी तक है। पंचमी को उपवास करना एवं भगवान की पूजा करना, षष्‍ठी से दशमी तक पूजा करना एवं दशमी को उपवास करना। आजकल दशमी को यह व्रत किया जाता है।

कैसे करें व्रत : सुगंध दशमी के दिन हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह इन पाँच पापों के त्‍यागरूप व्रत को धारण करते हुए चारों प्रकार के आहार का त्‍याग, निराग्रह आदि का परिमाण करके मंदिर में जाकर भगवान की पूजा, स्‍वाध्‍याय, धर्मचिंतन-श्रवण, सामयिक आदि में अपना समय व्‍यतीत करें। दस पूजाएँ करें। सायंकाल में दशमुख वाले घट में दशांग धूप आदि का क्षेपण कर रात्रि को भजन आदि में समय लगाएँ।

दूसरे दिन प्रात: अभिषेक-पूजा आदि करके पात्रदान कर पारणा करें। व्रत निर्विघ्‍न पूर्ण होने पर उद्यापन करें। मंडल मंडवाकर पूजन कराएँ। मंदिर में शास्‍त्र, उपकरण आदि भेंट करें। दस प्रकार के श्रीफल श्रावकों को बाँटें।
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