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खुद को खोजने का अवसर-पर्युषण
- अशोक चतुर्वेदी

धरती पर बिखरी बहुतेरी जीव प्रजातियों की तरह आदमी निरी देह की तरह जन्मता है। भूख, प्यास, काम और उत्सर्जन जैसी क्रियाओं में वह किसी भी दीगर प्राणी की बराबरी में रखा जा सकता है। जन्म से पशुवत्‌ होकर भी वह अपने लालन-पालन के दौरान सामाजिक व्यवहार के तौर-तरीके सीखता है, बल्कि धीरे-धीरे उस मार्ग पर मुड़ने की कूवत रखता है, जिसे आत्मिक उत्थान कह सकते हैं।

संसार के सभी धर्मों में किसी न किसी रूप में सत्य, सौमनस्य, त्याग, सहनशीलता, गंभीरता और नैतिकता का आग्रह दिखलाई पड़ता है। भारतीय समाज जिन्हें दैवीय गुण कहता आया है, उन्हें हासिल करने की कोशिश ही दरअसल पशुता से देवताई तक पहुँचने की राह है। इसी राह पर चल सकने की वजह से मनुष्य संसार की सभी जीव प्रजातियों में श्रेष्ठ और अनोखा है।

जैन धर्म संसार के सबसे पुराने मगर वैज्ञानिक सिद्धांतों पर खड़े धर्मों में से एक है। इसकी अद्भुत पद्धतियों ने मनुष्य को दैहिक और तात्विक रूप से मांजकर उसे मुक्ति की मंजिल तक पहुँचाने का रास्ता रोशन किया है। अनेक पर्व-त्योहारों से सजी इसकी सांस्कृतिक विरासत में शायद सबसे महत्वपूर्ण और रेखांकित करने जैसा सालाना अवसर है पर्युषण का। आचार्य मुक्तिसागरजी ने इसे आत्मशुद्धि का महापर्व कहा है।

पर्युषण का शाब्दिक अर्थ है सभी तरफ बसना। परि का मतलब है बिन्दु के और पास की परिधि। बिन्दु है आत्म और बसना है रमना। आठ दिनों तक खुद ही में खोए रहकर खुद को खोजना कोई मामूली बात नहीं है। आज की दौड़-भाग भरी जिंदगी में जहाँ इन्सान को चार पल की फुर्सत अपने घर-परिवार के लिए नहीं है, वहाँ खुद के निकट पहुँचने के लिए तो पल-दो पल भी मिलना मुश्किल है। इस मुश्किल को आसान और मुमकिन बनाने के लिए जब यह पर्व आता है, तब समूचा वातावरण ही तपोमय हो जाता है।

भोगवाद के दौर में सबसे पहली शर्त होती है खुद को भुलाना। पद, पैसा, नाम, प्रतिष्ठा, अहंकार और विलास के हजार-हजार साधनों से मनुष्य अपने को बहिर्मुख बनाता है। बड़ी कोशिश करनी पड़ती है इसके लिए, अन्यथा तो मनुष्य का सहज स्वभाव है, स्वयं में स्थिर रहना। मुक्ति, मनुष्य का मौलिक अधिकार है और सभ्यताओं ने उसे इससे वंचित करने के बहुतेरे उपक्रम किए हैं। हमारी शिक्षा पद्धति, सामाजिक और पारिवारिक संबंधों की समझ, कारोबार-व्यापार, यहाँ तक कि ज्ञान-विज्ञान को भी इस काम में लगाया गया है कि कैसे मनुष्य अपने सहज स्वभाव को भूलकर एक दौड़ में फँसे?
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