मुख्य पृष्ठ > धर्म-संसार > धर्म-दर्शन > जैन धर्म
सुझाव/प्रतिक्रिया मित्र को भेजियेयह पेज प्रिंट करें
 
शत्रु का डर दूर करने हेतु
हेतु- शत्रु का डर दूर होता है।

को विस्मयोऽत्र यदि नाम गुणैरशेषैः त्वं संश्रितो निरवकाशतया मुनीश ।
दोषैरुपात्त विविधाश्रय जात गर्वैः स्वप्नान्तरेऽपि न कदाचिदपीक्षितोऽसि ॥ (27)

आप में गुणों का समूह इतना तो खचाखच भरा है कि अब भाँति-भाँति का रूप लेने वाले अवगुण बेचारे सपने में भी आपकी ओर नजर नहीं डाल पाते! इसमें भला आश्चर्य क्या है?

ऋद्धि- ॐ ह्रीं अर्हं णमो तत्ततवाणं ।

मंत्र- ॐ नमो चक्रेश्वरी देवी चक्रधारिणी चक्रेणानुकूल साधय साधय शत्रुन उन्मूलय उन्मूलय स्वाहा।
और भी
प्रणांत कष्ट दूर करने हेतु
तप्त पदार्थ शीतल बनाने हेतु
मस्तक के रोग मिटाने हेतु
शरीर रक्षा करने हेतु
प्रेतबाधा वगैरह दूर करने हेतु
स्वजन वगैरह आकर्षित/वशवर्ती करने हेतु