इस्लाम महिला अधिकारों के बारे में क्या कहता है, यह जानने की जरूरत हर किसी को है। अक्सर इस मुद्दे पर भ्रम पैदा होता है। जब गुमराह तालिबानी महिलाओं के संदर्भ में कोई भी बेतुका फरमान जारी करते हैं और फिर उसे इस्लामिक फतवे के नाम से प्रचारित किया जाता है। अक्सर इसे इस्लाम का एक हिस्सा समझा जाता है, जो पूरी तरह गलत है। दरअसल ऐसी किसी भी बात से इस्लाम का ताल्लुक नहीं है जो मानव अधिकारों की रक्षा न करे। इस्लाम तो सजायाफ्ता कैदी के अधिकारों की भी बात करता है, फिर भला वह आम आदमी के खिलाफ जुल्म का हिमायती कैसे हो सकता है।कुरआन औरतों का जिक्र करते हुए कहता है- औरत प्रकृति की सबसे कोमल संरचनाओं में से एक है, इनसे वजन न उठवाओ। भारी-भरकम काम पुरुष करें और उन्हें चाहिए कि महिलाओं की हिफाजत करें। (भावार्थ) जब इस्लाम को किसी महिला के वजन उठाने पर ही एतराज है तो वह उस पर जुल्म की इजाजत कैसे दे सकता है। जो लोग भी महिलाओं पर जुल्म करते हैं, उनका वास्ता इस्लाम से नहीं हो सकता है, हालाँकि वे अपने कारनामों को इस्लाम का हिस्सा बताकर इस पाक मजहब को बदनाम करते हैं। इस्लाम को समझने के लिए सबसे पहले इसे संस्कृति विशेष और समाज विशेष की संरचना से अलग करके देखना जरूरी है। अफगानिस्तान में अगर कुछ लोग अपनी शैली में जीवनयापन करते हैं तो इसकी वजह सामाजिक व्यवस्था, अफगानिस्तान की संस्कृति है न कि इस्लाम। इस्लाम तो यूनिवर्सल है, यह दुनिया के सभी हिस्सों में समान है। अगर औरतों पर जुल्म करना अफगानिस्तान की संस्कृति रही है तो इसके लिए इस्लाम जिम्मेदार नहीं है, बल्कि इस्लाम तो इसे रोकता है और भटके हुए को सही रास्ते पर लाता है। अगर अफगानिस्तान में जुल्म करने वाले अगर सही मायनों में इस्लाम पर चल रहे हैं तो बाकी दुनिया के मुसलमान क्या कर रहे हैं? क्या वे इस्लाम का पालन नहीं कर रहे हैं? क्या इस्लाम की परिभाषा और माँग भौगोलिक स्थिति के साथ बदल जाती है? इन सभी सवालों का जवाब है, नहीं। कुरआन की ज्यादातर आयतें महिला और पुरुष दोनों को संबोधित करते हुए हैं, कुरआन का दृष्टिकोण दोनों के लिए समान है, यह महिला और पुरुष में भेदभाव नहीं करता। कुरआन कहता है- हमने महिला और पुरुष दोनों को एक समान आत्मा दी है, दोनों की महत्ता एक समान है।तलाक- अक्सर अज्ञानता में कहा जाता है कि इस्लाम ने तलाक के मसले पर औरतों के साथ सख्ती की है। यह पूरी तरह गलत है। जब हम इस्लाम की जड़े ही नहीं जानते तो फिर उस पर टिप्पणी कैसे कर सकते है? पैगंबर साहब की एक हदीस है- अल्लाह ने जिन चीजों की इंसान को इजाजत दी है, उसमें उसे सबसे ज्यादा नापसंद तलाक है। इस हदीस से सारी बात साफ हो जाती है। इस्लाम तलाक की इजाजत तब देता है जबकि जीवनसाथी का तरीका इस्लामिक न हो, वह आपके साथ एब्यूसिव हो, निर्दयी हो, जालिम हो और कुछ अन्य। तलाक का मसला बहुत संवेदनशील है, सामान्य जीवन में उसका ख्याल आना भी गुनाह माना गया है। |