- अजहर हाशमी माहे-मोहर्रम और महात्मा गाँधी में तारीखी ताल्लुक है। ऐसे भी और वैसे भी। ऐसे भी इस तरह कि आठ जनवरी को इस वर्ष (2009 में) हजरत इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) का योमे-शहादत है यानी मोहर्रम की दसवीं तारीख तो तीस जनवरी को शहीद दिवस है अर्थात महात्मा गाँधी का बलिदान दिवस। हजरत इमाम हुसैन (अलै.) पैगम्बर इस्लाम हजरत मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के नवासे (दौहित्र) थे, जिन्होंने अन्याय और आतंक के खिलाफ इनसान और इनसानियत की आवाज को बेबाकी और बहादुरी से बुलंद किया। हजरत इमाम हुसैन (अलै.) ने उस दौर के आतंकवादी यानी यजीद (जो छल-कपट से सत्ता हथियाकर खलीफा बना हुआ था और चमचों-चापलूसों के चंगुल में भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहा था तथा सुरा-सुंदरी में लिप्त होकर लोगों पर अत्याचार कर रहा था) को ललकारा और बेईमानी के लिए फटकारा। जिसके दिल में ईमान होता है वह दिलेर और अच्छा इनसान होता है।इसके बरअक्स जो बेईमान होता है वो षड्यंत्रकारी और शैतान होता है। दिलेरी और इनसानियत यानी हजरत इमाम हुसैन। षड्यंत्र और शैतानियत यानी यजीद। इमाम हुसैन यानी इनसानियत का नूर। यजीद यानी मनहूस और क्रूर। यजीद यानी आतंक का अँधियारा। इमाम हुसैन यानी रोशनी का फव्वारा। एक वाक्य में कहें तो यजीद रूपी आतंकवादी अँधेरे के खिलाफ लड़ते हुए उजाले की शहादत का पूरा नाम है इमाम हुसैन। मुख्तसर यह कि हजरत इमाम हुसैन (अलै.) ने अपने परिजनों और चुनिंदा साथियों के साथ करबला (अरब का रेतीला इलाका) की तरफ कूच किया और भूखे-प्यासे ही अन्याय के विरुद्ध लड़ते हुए शहीद हो गए, किंतु सुविधाओं का लालच देने वाले आतंकवादी और अन्यायी यजीद का आधिपत्य (बैअत) स्वीकार नहीं किया। |