मुख्य पृष्ठ > धर्म-संसार > धर्म-दर्शन > इस्लाम धर्म
सुझाव/प्रतिक्रियामित्र को भेजियेयह पेज प्रिंट करें
 
जुमा का बयान
मसअला- जिन लोगों पर जुमा फर्ज़ नहीं, अगर यह लोग जुमा पढ़े तो हो जाएगा यानी ज़ौहर की नमाज़ उनके जिम्मे से साक़िल हो जाएगी। मगर औरत के लिए ज़ौहर अफ़ज़ल है। (कानूने शरीअत सं. 113)

मसअला- जुमा के लिए छः शर्तें हैं। लिहाजा अगर इनमें से एक भी ना पाई गई तो जुमा होगा ही नहीं

पहली शर्त- शहर या शहरी जरूरियात से ताल्लुक रखने वाली जगह का होना और शरीअत में शहर से मुराद वह आबादी है, जिससे मोताअद्दीद कूचे व बाजार हों, वह जिला या तेहसील हो या ऐसा कस्बा हो कि उसके मुताल्लिक़ देहात गिने जाते हों।

लिहाजा छोटे-छोटे गाँव में जुमा नहीं पढ़ना चाहिए, बल्कि वहाँ जौहर की नमाज़ जमात से पढ़ी जाए, लेकिन जिन गाँवों में पहले से जुमा क़ायम है, वहाँ बंद का हुकुम न दिया जाए। मोजिद्दीदे दीनो मिल्लत इमाम एहमद रज़ा रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया कि अवाम जिस तरह से भी अल्लाह व रसूल का नाम ले, ग़नीमत है।

दूसरी शर्त- यह है कि बादशाह इस्लाम या उसका नाइब जुमा क़ायम करे और अगर वहाँ इस्लामी हुकूमत न हो तो सबसे बड़ा सुन्नी सहीहुल अक़िदा अलिमे दीन उस शहर का जुमा क़ायम करे, बगैर उसके इजाज़त के जुमा कायम नहीं हो सकता।

अगर यह भी न हो तो वहाँ के आम मुसलमान जिसको इमाम बनाए, वह जुमा क़ायम करे। हर शख्स को यह हक़ नहीं कि जब चाहे, जहाँ चाहे जुमा क़ायम करें।

तीसरी शर्त- ज़ौहर का वक्त होना लिहाजा वक्त से पहले या बाद में जुमा की नमाज़ पढ़ी गई तो जुमा की नमाज़ न होगी।

चौथी शर्त- ज़ौहर के वक्त ही में नमाज़ से पहले खुतबा का पढ़ना। खुतबा अरबी ज़बान में ही होना चाहिए।

पाँचवीं शर्त- जमाअत है जिसके लिए इमाम के सिवा तीन आक़िल और बालिग़ मर्दों का होना जरूरी है। अगर एक इमाम और दो मुक़तदी हों तो जुमा की नमाज़ नहीं हो सकती।

छठी शर्त- इज़नेआम है, यानी मस्जिद का दरवाज़ा खोल दिया जाए कि जिस मुसलमान का दिल चाहे वहाँ आए, लिहाजा बंद मकान में नमाज़े जुमा नहीं हो सकती।

मसअला- नमाज़े जुमा जामे मस्जिद में अफज़ल है और पाँचों वक्त की नमाज़ अपने महल्ले की मस्जिद में पढ़ना अफज़ल है (फतावा रज़विया जि. 3, स. 749)

<< 1 | 2 
और भी
इस्लाम की पाँच बुनियादी बातें
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम का बयान
वुज़ू का बयान
इंसानियत का पैगाम माह-ए-रमजान
नमाज का बयान
कुरान पाक का बयान