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तस्‍मै श्रीगुरूवे नम:
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- भीकशर्म
शरीरं सुरुपं तथा वा कलत्रं
यशश्चारू चित्रं धन मेरुतुल्यम्।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्में
तत: किं तत: किं तत: किं तत: किम्।

यदि शरीर रूपवान हो, पत्नी भी रूपसी हो, सत्कीर्ति चारों दिशाओं में विस्तारित हो, मेरु पर्वत के तुल्य अपार धन हो, किन्तु फिर भी गुरु के श्रीचरणों यदि मन आसक्त न हो तो इन सारी उपलब्धियों से क्या लाभ? श्री आदि शंकराचार्य से अपने इस एक श्लोक में गुरु की महिमा एवं महत्ता के बारे में सब कुछ कह दिया।

गुरुकाश्चान्धकारो हि रुकारस्तेज उच्यते।
अज्ञानग्रासकं ब्रह्म गुरुरेव न सशय:।

'गु' शब्द का अर्थ है अंधकार (अज्ञान) और 'रु' शब्द का अर्थ है प्रकाश ज्ञान। अज्ञान को नष्ट करने वाला जो ब्रह्म रूप प्रकाश है, वह गुरु है। अत: हम कह सकते हैं कि गुरु वह प्रकाश है, जो हमें अज्ञान से ज्ञान, अनीति से न‍ीति, दुर्गुण से सद्‍गुण, विनाश से कल्याण, शंका से संतुष्टि, घमंड से विनम्रता और पशुत्व से मानव बनने का मार्ग दिखाता है।

गुरु के बिना जीवन अधूरा है। शास्त्रों के अनुसार निगुरे को कभी मोक्ष प्राप्त नहीं होता, न ही उसे अपने द्वारा किए गए पुण्यों का संपूर्ण फल ही प्राप्त होता है।

वेद, शास्त्र, पुराण, मंत्र, यंत्र विद्या आदि बातें गुरुतत्व न जानने वाले भ्रांत चित्त वाले जीवों को पथभ्रष्ट करने वाली हैं और उनके लिए जप, तप, व्रत, तीर्थ, यज्ञ, ज्ञान से सब व्यर्थ हो जाते हैं।

शास्त्रों में कहा गया है कि सर्वतीर्थों में स्नान करने से जितना फल मिलता है, वह फल गुरु के चरणामृत की एक बूँद से प्राप्त होने वाले फल का एक हजारवाँ हिस्सा मात्र है।
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