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देवशयनी एकादशी-एक विवेचन
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इन सभी कल्पनाओं में श्रेष्ठ कल्पना यह है कि कर्मयोगी को मार्गदर्शन करने के लिए भगवान सो जाते हैं। प्रभु जो चार महीने सो जाते हैं उसे हमारे देश में वर्षा ऋतु कहते हैं।

सामान्य अवस्था में भी यदि भगवान सो जाएँ तो सृष्टि का व्यवहार नहीं चलेगा, तो वर्षाऋतु जैसे महत्वपूर्ण काल में जब समस्त सृष्टि की जल और अन्न की व्यवस्था करनी होती है तब भगवान सो जाएँ तो कैसे काम बनेगा? इसलिए कई लोगों को भगवान के सो जाने की कल्पना पुराण की एक कपोलकल्पित कथा लगती है।

वर्षा ऋतु में सृष्टि का सौंदर्य पूर्ण रूप से निखर उठता है, मानव को नवजीवन मिलता है, किसान को भरपूर फसल मिलती है और सर्वत्र आनंद का वातावरण बना रहता है। भगवान की इस कृपा से सिंचित हुआ कृतज्ञ बुद्धि का मानव देवमंदिरों में जाकर प्रभु के गुणगान गाता है- 'मेरा वैभव तुम्हारी कृपा का फल है।'

जब मानव प्रभु को ऐसा कहता है तब प्रभु उसे मानों समझाते हैं- 'मुझे मालूम नहीं है, मैं तो चार महीने सोया हुआ था। यह सारा वैभव और समृद्धि तेरे पसीने, परिश्रम और पुरुषार्थ का परिणाम है।'

काम करते समय सतत जागते रहना और फल आए तब अंजान होकर सो जाना इससे बढ़कर हृदय की विशालता और क्या हो सकती है? सच्चे कर्मयोगी को इससे श्रेष्ठ मार्गदर्शन कौन सा हो सकता है? जितनी भावना की दृष्टि से यह कल्पना भावपूर्ण है उतनी ही विचार की दृष्टि से यह माधुर्यपूर्ण लगती है।

इससे यह भी सीख मिलती है कि कर्म करो परंतु अभिमान न करो। कर्म करते समय 'मैं' की समाधि लगने दो, अहं को दबा दो, सुला दो, प्रभु सो गए यानी अहंकार रखे बिना वे कर्म तथा जगत व्यवहार करते रहे।

कर्ता जिसमें खो जाता है, लुप्त हो जाता है, समाधिस्थ हो जाता है, वही कृति श्रेष्ठ बनती है। सृष्टि सुंदर लगती है क्योंकि उसका सर्जक उसमें एकरूप हो गया है। आज हमें कीर्ति और स्तुति कितनी अच्छी लगती है! कोई स्तुति करे तब सो जाने की बात तो दूर रही किंतु यदि कोई सोया हुआ भी हो तो उसके पास जाकर उसे जगाकर हम स्वमुख से अपनी स्तुति करने लगते हैं।
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