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देवशयनी एकादशी-एक विवेचन
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-पूज्य पांडुरंग शास्त्री आठवल
आषाढ़ सुद एकादशी को देवशयनी एकादशी कहते हैं। उस दिन से चातुर्मास के व्रत का प्रारंभ होता है और देवदिवाली या कार्तिक एकादशी को उसकी पूर्णाहुति होती है।इस दिन से चार महीनों के लिए प्रभु सो जाते हैं। 'यथा देहे तथा देवे' यह कथन भाववान भक्तों की भावना का प्रतीक है।

'मुझे जो अच्छा लगता है वह मेरे प्रभु के लिए भी अच्छा है' इस भावना से ही भक्त प्रभु को फूल, इत्र, प्रसाद आदि अर्पण करता है। भक्त को स्नान अच्छा लगता है इसलिए वह प्रभु को भी स्नान कराता है। भक्त को अच्छे वस्त्र पहनना भाता है इसलिए वह प्रभु को भी सुंदर जरी के वस्त्र पहनाता है। काम करते-करते थक जाने पर वह आराम करता है और सो जाता है।

उसी तरह 'मेरे प्रभु को भी विश्व का व्यवहार चलाने में थकान लगी होगी इसलिए उन्हें भी आराम चाहिए, उन्हें भी चातुर्मास में सो जाना चाहिए' ऐसा भक्तिपूर्ण आग्रह भी भक्त ने रखा होगा। यह भक्तिशील हठ ही प्रभुशयन की इस कल्पना में सौंदर्य और माधुर्य लाता है।

मानव जैसे थककर सो जाता है वैसे कभी-कभी ऊबकर भी सो जाता है। जिद्दी लड़के से ऊबकर 'तेरे दिल में आए सो कर' ऐसा कहकर कई बार माँ या बाप सो जाते हैं। ऐसा ही भगवान का भी मानव के बारे में तो न हुआ होगा? इस दृष्टि से विचार करने पर भगवान का सो जाना मानव के लिए आत्मनिरीक्षण का विषय बन जाता है।

वर्तमान विषय में रस न होने पर भी मनुष्य सो जाता है। गंभीर व्याख्यानों में या नीरस चलचित्रों में बहुत से श्रोता और प्रेक्षकों को हम सोते हुए देखते हैं। विषय में नवीनता या मौलिकता का अभाव भी कई बार नींद का कारण बनता है।

एक ही विषय या दृश्य की बार-बार पुनरावृत्ति उस विषय या दृश्य के लिए अरुचि निर्माण करती है। वर्षों तक किसी विशिष्ट कार्य का उसमें प्रबंध नहीं होता है। ऐसे यांत्रिक जीवन की नीरसता भगवान को सो जाने के लिए प्रेरित करती हो, यह बहुत ही स्वाभाविक है।

कई बार दूसरों की परेशानी से बचने के लिए भी मनुष्य सो जाता है। भिखारी या चंदा इकट्ठा करने वाले लोग आते हैं तब कई बार आदमी उनसे बचने के लिए जानबूझकर सो जाता है। शिव कैलास में और विष्णु क्षीरसागर में कदाचित्‌ ऐसे लोगों से बचने के लिए तो नहीं गए होंगे?

भवसागर के मंदिर में छोटे-बड़े लोगों की जो भीड़ होती है वह सभी माँगने वालों की भीड़ है। भगवान से माँगना गलत बात नहीं है, माँगने वालों को भगवान देते भी हैं, परंतु भगवान को आनंद तब होगा जब कोई निरपेक्ष होकर उन्हें मिलने आए अथवा अपने कर्म के फल भगवान के चरणों पर समर्पित करने आए।
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