उद्देश्य दोनों का एक ही था, धर्म की स्थापना एवं अधर्म का नाश। साधु-संतों की रक्षा, दुष्टों का संहार। इस उद्देश्य की पूर्ति राम ने मर्यादा पुरुषोत्तम बनकर की और कृष्ण ने तो वर्जनाओं को तोड़ने से भी परहेज नहीं किया। 'शठे शाठ्यम समाचरेत' अर्थात कपटी को कपट से, अधर्मी को अधर्म से मारना भी उनकी दृष्टि में धर्म था।
संभवतः त्रेता से द्वापर तक आते-आते दुष्टता इतनी प्रबल हो गई थी कि नियमों की मर्यादा में रहकर इसका मुकाबला करना कठिन था। इसलिए अधर्मियों के नाश व धर्म की रक्षा के लिए महाभारत में कृष्ण कूटनीति से कपटियों को काल-कवलित करते हैं। गहराई से विचार करने पर लगता है कि कौरव पक्ष, पाण्डव पक्ष की तुलना में इतना शक्तिशाली था कि बिना छल-बल के उसे हरा पाना संभव नहीं था।
केवल धर्मराज युधिष्ठिर के सत्य धर्म के सहारे भीष्म, द्रोण, कर्ण, दुर्योधन, दुःशासन, जयद्रथ, शकुनि आदि की पराजय शक्य नहीं थी। जब धृतराष्ट्र कपटपूर्वक गले लगाने के लिए आगे बढ़े तो लौह प्रतिमा ही आगे बढ़ाना चाहिए। यही कृष्ण ने किया। उनकी मंशा बिलकुल स्पष्ट थी। बड़े उद्देश्य की पूर्ति के लिए छोटे उद्देश्यों की बलि चढ़ाने में कोई हर्ज नहीं है।
तत्कालीन आर्यावर्त के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बन जाने, द्वारकाधीश कहलाने के बाद भी उनसे बैर भाव रखने वाले समकालीन लोग उन्हें 'ग्वाला' कहकर अपनी खीज निकालते थे। लेकिन कृष्ण को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। उनकी दृष्टि सदैव अपने लक्ष्य की ओर रहती थी। सामरिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उन्होंने मथुरा छोड़ दी और द्वारका बसाई।
'रणछोड़' कहलाने के भय से उन्होंने भावी सफलता को दाँव पर नहीं लगाया। शकुनि यदि पाँसे के खेल में माहिर था, तो कृष्ण ने योद्धाओं और राज्यों तक का पाँसों की तरह उपयोग किया। राम प्रारंभ से अंत तक राम ही नजर आते हैं। रघुकुल तिलक, मर्यादा पुरुषोत्तम, कर्तव्य परायण, लोककल्याणकारी, मातृ-पितृभक्त, एक पत्नीव्रतधारी, सहज, सरल, सत्यनिष्ठ।
लेकिन कृष्ण का स्वरूप सदैव बदलता रहता है। गोकुल में वे नटखट कान्हा, बालमुकुंद, श्यामसुंदर, बंशीवाले, गाय चराने वाले, रास रचाने वाले, माखन चुराने, गोपियों से छेड़छाड़ करने, ग्वाल टोली का नेतृत्व करने वाले नंदकिशोर थे तो मथुरा पहुँचते ही उनके जीवन का एकदम नवीन अध्याय प्रारंभ हो गया।
कृष्ण माधुर्य में डूबी 'राधा' सुधबुध भूली अपने बाल सखा की प्रतीक्षा ही करती रह जाती है, पर कृष्ण फिर गोकुल की ओर नहीं पलटते। हस्तिनापुर में फिर हमें एक अलग ही कृष्ण नजर आते हैं, जो प्रखर राजनीतिज्ञ हैं। धीरे-धीरे योद्धा कृष्ण, योगेश्वर और युगपुरुष बन जाते हैं। योगेश्वर कृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से विश्व को ज्ञान का अनोखा भंडार 'भगवत गीता' दिया जिसके अंतिम श्लोक में वे स्वयं कहते हैं-'यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरःतत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा, नीतिर्मतिर्मम..॥
'जहाँ योगेश्वर भगवान कृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव धनुषधारी अर्जुन हैं, वहीं पर श्री विजय, विभूति और अचल नीति है। कृष्ण उस युग की आवश्यकता थे। हर युग को कृष्ण मिलते हैं, आवश्यकता है पार्थ बनने की।
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