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कृष्ण और गोपिकाएँ

वास्तव में यह प्रेम का सबसे नीचा स्वरूप है। सबसे ऊँचा प्रेम तो तब होता है, जब मनुष्य सर्वभूतस्थ्मात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि का प्रत्यक्ष अनुभव करने लग जाता है। नीचे दर्जे के प्रेम का (जिसे काम कहते हैं) शरीर और मन दोनों से संबंध है।

स्त्री और पुरुष के शरीर में एक-दूसरे के प्रति एक प्रकार का पाशविक आकर्षण होता है, साथ ही चित्त को प्रेमास्पद के मानसिक सौन्दर्य का ध्यान करने में आनन्द प्राप्त होता है।

दोनों एक-दूसरे के सहवास में आनन्द का अनुभव करते हैं और एक-दूसरे के गुणों को देख-देखकर सुखी होते हैं, किन्तु यह सब इन्द्रियजन्य होने से इसे ऐन्द्रिय प्रेम कहते हैं। इस प्रेम का व्यक्ति से संबंध होता है, विश्व से नहीं।

श्री कृष्ण और गोपियों के प्रेम में यह बात नहीं थी, वह तो महान था, इन्द्रियातीत था और आत्यात्मिक था। पाश्चात दार्शनिक प्लैटो के मत में प्रेम वही है, जिसमें काम का लेश भी न हो। गोपियों के प्रेम का भी यह एक तटस्थ रूप ही है।

श्री कृष्ण मुरलीधर के नाम से प्रसिद्ध हैं। यह सबके अनुभव की बात है कि संगीत कला कोविद मनुष्य अपने उत्तम संगीत से श्रोताओं को, चाहे वे स्त्री हों या पुरुष, आनन्द से मुग्ध कर सकता है। फिर श्री कृष्ण तो साक्षात्‌ नाद ब्रह्म के स्वरूप ही थे।

उनके दिव्य संगीत उपनिषद् सार श्रीमद्भगवद् गीता ने स्त्रियों और शूद्रों तक के लिए जो उसके अधिकारी नहीं समझे जाते थे, मोक्ष का द्वार खोल दिया है। फिर यदि व्रज की पवित्र हृदया स्त्रियां उन्हें अपना उद्धारक समझकर उनके प्रति अनन्य प्रेम करने लगीं तो इसमें आश्चर्य की कौन सी बात है?
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