मंत्रों का सौंदर्य वेद के मंत्रों में सुंदरता भरी पड़ी है। वैदिक पंडित जब स्वर के साथ वेद मंत्रों का पाठ करते हैं, तो चित्त प्रसन्न हो उठता है। जो भी सस्वर वेदपाठ सुनता है, मुग्ध हो उठता है।
इतना ही नहीं, ऋचाओं में जो अर्थ भरा है, वह तो उससे भी सुंदर है। उनमें जो भाव भरे हैं, वे मनुष्य को ऊपर उठाने वाले हैं। समाज को ऊपर उठाने वाले हैं। उनसे आत्मा का भी कल्याण होता है, समाज का भी।
कर्म, ज्ञान और उपासना
वेदों के मुख्य रूप से तीन भाग हैं : 1) कर्मकाण्ड, 2) ज्ञानकाण्ड और 3) उपासनाकाण्ड
कर्मकाण्ड में यज्ञ कर्म दिया गया है, जिससे यज्ञ करने और कराने वाले को लोक-परलोक में सुख मिले।
ज्ञानकाण्ड में परमात्मा और आत्मा का तत्व और लोक-परलोक का रहस्य बताया गया है।
उपासनाकाण्ड में ईश्वर भजन की विधि बताई गई है। इससे मनुष्य को लोक-परलोक में सुख मिल सकता है और ईश्वर की प्राप्ति हो सकती है।
ब्राह्मण में कहा है वेदों के दो मुख्य विभाग हैं : संहिता और ब्राह्मण। संहिता को वेद कहते हैं। उसमें मंत्र हैं। ब्राह्मण ग्रंथों के तीन भाग हैं : 1) ब्राह्मण, 2) आरण्य और 3) उपनिषद्
ब्राह्मण ग्रंथों में मुख्य रूप से यज्ञों की चर्चा है। वेदों के मंत्रों की व्याख्या है। यज्ञों के विधान का विस्तार से वर्णन है।
मुख्य ब्राह्मण 3 हैं : 1) ऐतरेय, 2) तैत्तिरीय, 3) शतपथ
आरण्यक में कहा है वेदों की रचना ऋषियों ने की है। वे रहते थे वनों में, जंगलों में। वन को संस्कृत में कहते हैं 'अरण्य'। अरण्यों में बने हुए ग्रंथों का नाम पड़ गया 'आरण्यक'।
मुख्य आरण्यक पाँच हैं : 1) ऐतरेय, 2) शांखायन, 3) बृहदारण्यक, 4) तैत्तिरीय और 5) तवलकार।
उपनिषद वेद के अंतिम भाग का नाम है उपनिषद्। उपनिषद् शब्द बना है सद् धातु से। सद् का अर्थ होता है नाश होना, मिलना और शिथिल करना। उपनिषद् का अर्थ है ब्रह्मविद्या। ब्रह्मविद्या से अविद्या का नाश होता है, आनंद मिलता है और जन्म-मरण का दुःख छूट जाता है।
मुख्य उपनिषद् सभी वेदों की अपनी-अपनी उपनिषदें हैं। आजकल 108 उपनिषदें मिलती हैं। मुख्य उपनिषदें हैं- ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुंडक, मांडूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छांदोग्य, बृहदारण्यक और श्वेताश्वर।
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