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वैदिक धर्म क्या कहता है

ऋग्वेद में कहा है :-

ऋतस्य पन्थां न तरन्ति दुष्कृतः

वे
हिन्दू धर्म का मूल आधार है वेद। वेद का अर्थ है ज्ञान। संस्कृत की 'विद्' धातु से 'वेद' शब्द बना है। 'विद्' यानी जानना।

वेद को 'श्रुति' भी कहा जाता है। 'श्रु' धातु से 'श्रुति' शब्द बना है। 'श्रु' यानी सुनना। कहते हैं कि ऋषियों को अंतरात्मा में परमात्मा के पास से ज्ञान सुनाई पड़ा।

वेद चार हैं : ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद।

ऋग्वेद : यह सबसे पुराना वेद है। इसमें 10 मंडल हैं और 10552 मंत्र। ऋग्वेद की ऋचाओं में देवताओं की प्रार्थना और स्तुतियाँ हैं।

यजुर्वेद : इसमें 1975 मंत्र और 40 अध्याय हैं। इस वेद में अधिकतर यज्ञ के मंत्र हैं।

सामवेद : इसमें 1875 मंत्र हैं। ऋग्वेद की ही अधिकतर ऋचाएँ हैं। इस संहिता के सभी मंत्र संगीतमय हैं, गेय हैं।

अथर्ववेद : इसमें 5987 मंत्र और 20 कांड हैं। इसमें भी ऋग्वेद की बहुत-सी ऋचाएँ हैं।
चारों वेदों में कुल मिलाकर 20389 मंत्र हैं।

वैदिक ऋषि
प्राचीनकाल में हमारे देश में जो लोग ज्ञानी थे, आचार-विचार वाले थे, जिनका हृदय उदार था, जिनके विचार ऊँचे थे, उन्हें लोग 'ऋषि' कहा करते थे। 'सादा जीवन, उच्च विचार' उनका आदर्श था।

वे धर्म के गूढ़ विषयों पर चिंतन करते थे, सादा और पवित्र जीवन बिताते थे और समाज को सही रास्ता दिखाया करते थे। वैदिक साहित्य इन ऋषियों की ही पवित्र धरोहर है। 5000 साल पहले भी उससे लोगों को प्रेरणा मिलती थी और आज भी मिलती है।

वैदिक देवता

वेदों में हमें बहुत से देवताओं की स्तुति और प्रार्थना के मंत्र मिलते हैं। इनमें मुख्य-मुख्य देवता ये हैं :

अग्नि, वायु, इंद्र, वरुण, मित्र, अश्विनीकुमार, ऋतु, मरुत्‌ त्वष्टा, सोम, ऋभुः, द्यौः, पृथ्वी, विष्यणु, पूषण, सविता, उषा, आदित्य, यम, रुद्र, सूर्य, बृहस्पति, वाक्‌, काल, अन्न, वनस्पति, पर्वत, पर्जन्य, धेनु, पितृ, मृत्यु, आत्मा, औषधि, अरण्य, श्रद्धा, शचि, अदिति, हिरण्यगर्भ, विश्वकर्मा, प्रजापति, पुरुष, आपः, श्री सीता, सरस्वती।

कभी तो हम शरीर को मनुष्य कहते हैं, कभी उसकी आत्मा को। उसी तरह वैदिक ऋषि भी दो रूपों में देवताओं की प्रार्थना करते थे। कभी जड़ पदार्थ के रूप में, कभी उस जड़ के भीतर रहने वाले चेतन परंपरा के रूप में। जैसे- 'सूर्य' शब्द से कभी उनका आशय होता था उस तेज चमकते हुए गोले से, जिसे हम 'सूर्य' कहकर पुकारते हैं।

कभी 'सूर्य' से उनका आशय होता था, सूर्य के रूप में प्रकाशमान परमात्मा से। ऋषियों का ऐसा विश्वास था कि एक ही महान सत्ता नाना देवताओं के रूप में बिखरी है। उसी की वे स्तुति करते थे, उसी की प्रार्थना। उसी की वे उपासना करते थे। उसी को प्रसन्न करने के लिए वे यज्ञ करते थे।
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