हिंदू धर्म का कोई संस्थापक नहीं है। जैसा कि हम देख चुके हैं, इसने अनेक सदियों में विभिन्न मूलों के अनेक जनगण के विश्वासों से स्वरूप ग्रहण किया और भारत के ऐतिहासिक विकास के साथ घनिष्ठ और सशक्त रूप से संबद्ध हो गया। इसी से अन्य धर्मों को बिना किसी हठधर्मिता के देख पाने की और न केवल उनको बल्कि उनके 'भटकावों और अपधार्मिक विचारों' तक को स्वयं अपने आँचल में स्थान देने की उसकी प्रवृत्ति का स्पष्टीकरण मिलता है।
इस प्रकार उसने 'अन्य देवताओं', 'अन्य पैगंबरों' और 'अन्य मार्गों' को इस शिक्षा के साथ अकसर स्वीकार किया है कि भगवान बुनियादी रूप से एक और सदा वही हैं, फिर चाहे उनको कोई भी नाम क्यों न दिया जाए। सुप्रसिद्ध हिंदू दार्शनिक कुमारस्वामी ने कहा था- 'किसी चीज को कोई नाम देने का अर्थ यह नहीं कि आपने उसको अपना बना लिया है या उसकी व्याख्या कर ली अधिकांश अहिंदुओं के लिए 'भगवान' ब्रह्मांड के जनक और विश्वव्यापी नैतिक कानून के संस्थापक हैं। वही शब्द उसी अर्थ के साथ यहूदी, ईसाई और इस्लाम धर्म में इस्तेमाल किया जा सकता है। इन धर्मों में भगवान और मनुष्य के बीच एक 'संबंध' है। लेकिन ज्यों ही हम भारतीय चिंतन के संसार में प्रवेश करते हैं, स्थिति बदल जाती है।
यहाँ परम पुरुष या 'प्रथम कारण' की धारणा बिलकुल भिन्न है और विशेषकर उपनिषदों में उपलब्ध बौद्धिक बुलंदियों के क्षेत्र में जहाँ द्वैत और 'संबंधों' का अस्तित्व समाप्त हो जाता है और मुक्ति का अर्थ होता है परतत्व के साथ व्यक्ति की एकात्मकता या और बेहतर ढंग से कहा जाए तो व्यक्ति की देवत्व के सारतत्व से 'एकरूपता'।
इस वैचारिक ढाँचे में, परम पुरुष अपने को अनंत रूपों में अभिव्यक्त करता है जिनका केवल एक संघटना के रूप में ही अस्तित्व होता है और जो अनुभूति आश्रित अनुभव द्वारा सच्चे सारतत्व को ग्रहण कर पाने की अक्षमता और हमारी अविद्या की उपज होते हैं। यह अविद्या, जो माया को यानी एक भ्रम को जन्म देती है, वेदांत का मुख्य विषय है।
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