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विपश्यना: सुलभ और सार्वजनीन
मानसिक शांति का मार्ग
अगर अपनी कमजोरियों का अनुभव यदि स्पष्ट हो जाए तो हम उनमें से निकल जाएँगे। वक्त तो लग सकता है किंतु रास्ता मिल जाता है। अगर हमें क्रोध की आग का अनुभव होने लगे तो हमें तुरंत समझ में आ जाएगा कि किसी दूसरे पर हमारे क्रोध की आग का कोई प्रभाव होगा या नहीं, लेकिन हम उससे तुरंत और अवश्य जलेंगे।

विपश्यना का काम श्वास से प्रारंभ होता है। श्वास हमारे अस्तित्व का सबसे बड़ी प्रतीक है। यह सरल-सा प्रतीत होने वाला काम ही अपने बारे में कई सत्यों को उजागर करने लगता है। चित्त की योग्यता में थोड़ा विकास होने पर उसे अपने शरीर की सच्चाई को अनुभव करने की विद्या में लगा दिया जाता है। बस, इतना ही करना है। अपनी सच्चाई को देखते-देखते अपने स्वभाव को पलटना।

स्वभाव इसलिए पलटता है, क्योंकि श्वास और शरीर का संवेदनाओं का हमारे मानस से गहरा संबंध है। जबकि हम हमारे मानस को सीधे नहीं देख पाते, श्वास और शरीर को देखते-देखते उसका पुट-पुट खोल सकते हैं। यह लाखों लोगों का अनुभव है। विपश्यना करीब साढ़े दस दिन के शिविर में किसी केंद्र में रहते हुए ही सीखनी पड़ती है।

इन दस दिनों के लिए सर्वमान्य शील-सदाचार के नियम जैसे अहिंसा, चोरी नहीं करना इत्यादि का पालन अनिवार्य है। और चूँकि मन को उसके स्वभाव के विपरीत अपने भीतर की सच्चाई जानने के लिए लगाना है और उसे एक्सपर्ट बनाना है, उसे बाहर जाने से रोकना होता है। इस कारण शिविर के पहले नौ दिनों तक पूर्ण रूप से मौन रहना, अपने में रहना अनिवार्य होता है। अगर सोचें तो यह बहुत आसान है। आखिर भला हम जब सोते हैं, कोई काम में व्यस्त होते हैं या बीमार होते हैं तो चुप ही रहते हैं। और इस तरह अगर मौन की उपयोगिता समझ लें तो साधारण व्यक्ति भी इस परम उपकारी मौन को सहज अपना लेता है। विपश्यना का सारा काम पुराने साधकों की कृतज्ञता तथा अन्य लोग भी मान्यता के अंधकार से निकले, ऐसी भावना से दिए हुए दान से ही चलता है। विपश्यना किसी भी प्रकार से शुल्क या फीस बिना सर्वथा मुफ्त सिखाई जाती है।

विपश्यना विद्या पिछले चालीस वर्षों से भारत और विश्व में फिर से सुलभ हुई है- भारत की अत्यंत प्राचीन और कई शास्त्रों में बताई गई विद्या- करीब 2000 वर्ष तक ब्रह्म देश या बर्मा के कुछ लोगों के पास रत्न की तरह सुरक्षित रही। सत्यनारायण गोयन्का 1969 में अपने महान गुरु सयाजी उ बा खिन के आदेश पर भारत आए। पू. गोयन्काजी के विलक्षण, करुणामय व कठिन परिश्रम से विपश्यना आज विश्व के 150 देशों में उपलब्ध है, इनमें से भारत में 60 केंद्र हैं। सभी केंद्रों में एक जैसी ही शिक्षा उपलब्ध हैं। चूँकि विपश्यना मार्ग में किसी देवी, देवता, क्रिया-कांड, गुरु पूजा या कृपा
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