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दुःख दूर करे ध्यान
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आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति के समय इंद्रियों का अस्तित्व नहीं रहता तथा चित्त का कोई भी भाग कार्यरत नहीं होता है तब जो ज्ञान होता है उसे आत्मिक या आध्यात्मिक ज्ञान कहा जाता है। यह आनंद स्वरूप होता है। इसका वर्णन वाणी या लेखन से समझाना असंभव है। इसकी तो स्वयं अनुभूति ही होती है।

चित्त का एक स्तर मन है। यह विचारों का पुंज है। मन हमारे नियंत्रण में है तब तक वह अपना मित्र है और नियंत्रण से बाहर हो जाता है तब वह शत्रु बन जाता है। इसकी क्षमता प्रकाश के वेग से लगभग दुगुनी है।

मन को दो भागों में बाँटा जा सकता है- (1) चेतन मन और (2) अवचेतन। चेतन मन हमारे अधिकांश कार्यों को नियंत्रित, प्रभावित या प्रेरित करता है, जबकि अवचेतन मन हमारे संस्कार, इच्छाओं, आकांक्षाओं, वासनाओं और भावी योजनाओं को संग्रहीत करता है।

3-4 माह प्रतिदिन 10-15 मिनट एकाग्रता एवं ध्यान करने के प्रयास से मन शुद्ध होकर राग-द्वेष, काम-क्रोध, सत्य-असत्य, बड़ा-छोटा, श्वेत-श्याम आदि भेद कम होने लगते हैं। व्यक्ति एवं पदार्थ की ओर देखने की दृष्टि बदल जाती है। सत्य के दर्शन होने लगते हैं। असमंजस की स्थिति समाप्त हो जाती है।

ध्यान के अभ्यास से अनेक भौतिक लाभों में वातावरण बदलने पर सहन करने की व्यक्तिगत शक्ति बढ़ जाती है। एक कार्य पर मन लगाने से अवसाद या अरुचि उत्पन्न नहीं होती है। लगभग 20 घंटे कार्य करने के बाद भी मनोकायिक शक्ति का ह्रास नहीं होता, ध्यान करने का यही सबसे बड़ा भौतिक लाभ है। साथ ही हमें विषय का सत्य ज्ञान होने लगता है, यह आध्यात्मिक लाभ है।
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