-डॉ. बी.के. बांद्रे मन को विचारों के संग्रह के आधार पर दो भागों में बाँटा जाता है। एक भाग काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, से भरा रहता है। दूसरा भाग भौतिक ज्ञान, विवेक, क्षमा, दया, अहिंसा आदि से भरा रहता है। मन पर नियंत्रण है तो अच्छे गुणों से उसे परिपूर्ण किया जा सकता है अन्यथा वह दुर्गुणों से ही भरा रहेगा।
भारत के महान दार्शनिकों ने जीवन के सच्चे दर्शन व अथाह दुखों को समझने के लिए विविध विधाओं या दर्शनशास्त्रों की रचना की थी। सच्चा ज्ञान कैसे संभव है- यह दर्शनों का सार है। लगभग सभी दर्शनों में मन को बुद्धि के स्तर पर समझाने का प्रयत्न किया गया है।
भारतीय षट्दर्शन में योग दर्शन ने ही प्रत्यक्ष प्रयोगों के साथ शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार और अंत में आत्मा को समझने का व्यावहारिक मार्ग बताया है। ज्ञान दो प्रकार के होते हैं- (1) आध्यात्मिक ज्ञान, (2) भौतिक ज्ञान।
भौतिक ज्ञान का संचालन बुद्धि करती है अतः बुद्धिजीवी को प्रयोग के माध्यम से आत्मतत्व का ज्ञान करना आवश्यक है। वे बुद्धि की कसरत करने में ही संलग्न रहते हैं और उनमें प्रत्यक्ष प्रयोगों का पूर्णतः अभाव रहता है।
सामान्य बुद्धि वाले लोग यदि प्रयोगों के साथ सिद्धांतों को भी अपनाएँगे, तभी उपरोक्त दोनों प्रकार के ज्ञान प्राप्त हो सकते हैं। चित्त जब मन या बुद्धि का आकार धारण करता है तब विषय का ज्ञान इंद्रियों के माध्यम से होता है, उसे भौतिक ज्ञान कहते हैं।
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