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क्रिसमस : हर्षोल्लास का पुनीत पर्व
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भले हिन्दुस्तान में ईसाइयों की संख्या कम हो, लेकिन भूमंडलीकरण के चलते अब क्रिसमस पूरी दुनिया का त्योहार बन गया है। यह स्वाभाविक भी है। आखिर जो त्योहार दुनिया की सबसे बड़ी आबादी का त्योहार है, वह पूरी दुनिया का त्योहार भला क्यों नहीं बनेगा। इसलिए अब पूरी दुनिया में क्रिसमस धूमधाम से मनाया जाता है।

जिस तरह दिवाली और ईद के समय बाजार का त्योहारी मूड हो जाता है, उसी तरह क्रिसमस के आते ही बड़ी-बड़ी क्रिसमस सेल की घोषणाएँ होने लगती हैं। उपहारों की खरीददारी, उन्हें प्रियजनों की नजरों से छिपाना, कैरोल सिंगिंग ये सब कुछ क्रिसमस से जुड़े नजारे हैंजो हरेक को अपनी तरफ आकर्षित करते हैं। पहले क्रिसमस की सेल योरप में ही लगती थी लेकिन अब गोआ, केरल और मुंबई ही नहीं उत्तरी भारत के लखनऊ, मेरठ और इलाहाबाद जैसे शहरों में भी क्रिसमस सेल की रौनक देखी जा सकती है।
  भले हिन्दुस्तान में ईसाइयों की संख्या कम हो, लेकिन भूमंडलीकरण के चलते अब क्रिसमस पूरी दुनिया का त्योहार बन गया है। यह स्वाभाविक भी है। आखिर जो त्योहार दुनिया की सबसे बड़ी आबादी का त्योहार है।      


आदमी चाहे जिस देश-वेश में रहता हो आदमी की फीलिंग्स, उसकी भावनाएँ पूरी दुनिया में एक जैसी होती हैं। चूँकि हिन्दुस्तान के ईसाई पीढ़ियों से ईसाई नहीं थे, ये ज्यादातर लोग पहले हिन्दू थे इसलिए इनके खान-पान, व्यवहार और संस्कृति में अभी भी उनके पुराने संस्कार मौजूद हैं।

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वैसे पूरी दुनिया में क्रिसमस मनाने का कोई एक ढंग नहीं है। यहाँ तक कि 25 दिसंबर की अर्धरात्रि में गाया जाने वाला समूहगान भी कई जगह स्थानीय आदर्शों, उद्देश्यों और संकल्पों को अपने आप में समाहित कर लेता है। हर देश की अपनी मौलिक संस्कृति है। इसलिए हर देश अपने ढंग से खुशियों का इजहार करता है। इससे हर्षोल्लास फीका नहीं होता बल्कि सतरंगा हो जाता है।

ग्रीन पार्क मेथोडिस्ट चर्च में नियमित जाने वाली सुशीला राव कहती है- क्रिसमस का सच्चा उल्लास उपहारों के चमकीले कागजों, मेवों से भरपूर केक, गहनों, कपड़ों में ढूँढने के बजाय लोगों की आँखों में ढूँढना चाहिए। क्योंक किसी भी त्योहार की आत्मा उसका उल्लास ही होता है और उल्लास को उपहारों में नहीं खरीदा जा सकता।
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