वह आश्चर्यचकित हो उसकी ओर देखता ही रह गया और तब अपने हाथ की लकड़ी नीचे फेंककर बड़ी देर तक बैठे सोचते विचारते रहा। जब वह गिरजा से वापस लौटी तो उसने उसे नाश्ते की मेज तैयार करते पाया और अपने छोटे-मोटे कार्यों से उस घटना के लिए क्षमा याचना प्रदर्शित करने लगा। शाम तक वह इस विषय पर बात करता रहा। 'प्रिय, क्या तुमने वास्तव में यह सोच लिया था कि मैं तुम्हें मारूँगा।' उसने उत्तर दिया, 'मैं नहीं जानती मार्क।'... परन्तु इतना जानती हूँ कि तुम मुझे जो कुछ भी कर सकते थे उसके बजाय मैं ईश्वर का निरादर करने से अधिक डरती थी।'
बाद में उसने उसे ख्रीस्तयाग में जाने से नहीं रोका और धीरे-धीरे वह विश्वास की प्रशंसा करने लग गया, जिसने उसे हिम्मत और भक्ति दी। उसने बाद में उसे धर्मशिक्षा के लिए तैयार कर ही लिया और वह खुशी का दिन आ ही गया, जब उसने स्नान संस्कार ग्रहण किया।
उसने स्वयं यह कहानी अपनी शादी की रजत जयंती पर कही।
आनन्दमय विवाह के लिए कुछ उपयोगी सलाह
1. दोनों सदस्य काथलिक धर्म के मानने वाले हों। 2. पुरुष नौकरी वाला हो (इस आश्वासन के भ्रम में मत रहो कि जल्दी ही 'मुझे नौकरी मिलने वाली है।')। 3. विवाह का सही दृष्टिकोण रखो कि यह एक पवित्र एकीकरण है, ईश्वर द्वारा स्थापित है, जो कि पवित्रता और अनन्त मुक्ति का साधन ... और मानव जीवन संचार के उद्देश्य के लिए है। 4. शादी के पहले- अपने साथी के चुनाव के लिए समय लो। माता-पिता और पल्ली पुरोहित की सलाह पर कान दो। किसी ऐसे को चुनो जो तुम्हारे काथलिक आदर्शों का भागीदार बने और वास्तव में, ईमानदार, आश्रित, सच्चा और पवित्र हो। 5. विवाहित व्यक्तियों को एक-दूसरे का आदर करना चाहिए। अपने मन को वश में करने का अभ्यास करना चाहिए और अपनी समस्याओं को बच्चों के समान नहीं, वरन् बड़ों की तरह विचार-विमर्श करना चाहिए।
संत पौलुस कलीसियों को लिखते समय अच्छी शिक्षा देते हैं, 'यदि किसी को किसी से कोई शिकायत भी हो, तो सहनशील बनें और एक-दूसरे को क्षमा कर दें। जैसे प्रभु ने आपको क्षमा कर दिया है, वैसे ही आप लोग भी किया करें, परन्तु इन सब के ऊपर प्रेम बनाए रखें, जो सिद्धि का सूत्र है। ख्रीस्त की शांति आपके हृदयों में राज्य करे, इसी कारण आप एक शरीर में बुलाए गए हैं। आप कृतज्ञ बने रहें।
पत्नियों, आप अपने पतियों के अधीन रहें, जैसे प्रभु में उचित है। ऐ, पतियों, आप अपनी पत्नियों को प्यार करें, उनके साथ कटु बर्ताव न करें।' (1 कलोसियों 3:13-15, 18-19)
6. आलोचना मत करो- अपने साथी की गलतियों की आलोचना करना या अपना ही राग बारम्बार आलापना सुखी विवाह का नाश कर देता है। 'दोष न लगाओ कि तुम पर दोष न लगाया जाए, क्योंकि जिस न्याय से तुम न्याय करते हो, उसी से तुम्हारा न्याय किया जाएगा और जिस नाप से तुम नापते हो, उसी नाम से, तुम्हारे लिए नापा जाएगा।' (मत्ती 7:1-2)
7. एक-दूसरे पर पूरा भरोसा रखो- जलन रखना या बिना प्रमाण दोष लगाना पाप है।
8. तुम्हारा प्रथम कर्त्तव्य अपने विवाहित साथी के प्रति है, माता-पिता और दूसरे जन, दूसरे स्थान पर आते हैं। 'इसी कारण आदमी, अपने माता-पिता को छोड़कर अपनी पत्नी के साथ संयुक्त हो जाता है और वे एक तन हो जाते हैं।'
9. मिल-जुलकर रहो- पति-पत्नी को अपने बच्चों के साथ अपने घर में खुश नजर आना चाहिए... और उन्हें दूसरे सुखी परिवार के साथ मेल रखना चाहिए।
10. अपने घर को आनंदमय स्थान बनाओ- पत्नी को चाहिए कि वह अपने घर को आनंदमय स्थान बनाए कि उसका पति जब लंबे समय के काम से घर लौटे तो उसे साफ, सुव्यवस्थित एवं खाना तैयार पाए। 'वह पति सौभाग्यवान है, जिसे पत्नी अच्छी मिली है, उसकी आयु दोगुनी हो जाती है। परिश्रमी स्त्री पति को सुख पहुँचाती है, इस तरह उसका जीवन शांतिपूर्ण और दीर्घ हो जाता है। अच्छी स्त्री शुभ वरदान है, प्रभु से भय खाने वाले को वह मिलता है। फिर चाहे वे धनी हो या गरीब हो, उसका हृदय संतुष्ट रहता है और उनके चेहरे पर सदा मुस्कुराहट बनी रहती है।' (प्रवक्ता ग्रंथ 26:1-4)
11. परिवार के धन का उचित उपयोग करो- पति को अपनी पत्नी और बच्चों को संभालना है, पत्नी को परिवार के पैसों को बुद्धिमानी से खर्च करना है।
'यदि कोई स्वजनों और विशेषतः अपने परिवार की देखरेख नहीं करता, तो वह विश्वास को त्याग चुका है और अविश्वासी से भी बुरा है।' (1 तिमथी 5:8)
12. एक साथ प्रार्थना करो- जिस तरह कहावत है, जो परिवार एक साथ प्रार्थना करता है, वह एक साथ रहता है। 'ख्रीस्तयाग में भाग लेने एवं एक साथ परमप्रसाद ग्रहण करने और घर में खाने के पूर्व और बाद की प्रार्थनाएँ सुबह और शाम की प्रार्थनाएँ एवं पारिवारिक मालाविनती एक साथ करना सभी इसमें शामिल है।
'क्योंकि जहाँ दो या तीन मेरे नाम में एकत्र होते हैं, मैं वहाँ उनके मध्य हूँ।' (मत्ती 18:20)
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