विवाह एक संस्कार है- जिसके द्वारा स्त्री और पुरुष विवाह सूत्र में संयुक्त हो जाते हैं और एक-दूसरे के प्रति मरने तक विश्वासी बने रहने की प्रतिज्ञा करते हैं और जो बच्चे ईश्वर उन्हें देगा, उनकी आध्यात्मिक और शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने की प्रतीज्ञा करते हैं।
'सब विश्वासी के साथ विवाह करना' सफल जीवन के लिए उचित नियम है। क्यों? क्योंकि इस जीवन में स्वयं विवाह की बहुत सी समस्याएँ हैं, अतः यथासंभव इन समस्याओं को कम करने का प्रयत्न करना चाहिए और आज के हमारे युग में समझदार व्यक्ति अनुभव करते हैं कि धार्मिक आचार व्यवहार और उन लोगों को खुशियों के लिए 'विजातीय विवाह' पुराने दिनों की अपेक्षा आज ज्यादा खतरनाक है।
पहले यह समझा जाता था कि 'विजातीय विवाह' एक काथलिक और 'विश्वासी ख्रीस्तीय' की शादी है। आज वह बात नहीं रही। हो सकता है कि गैर काथलिक सदस्य का धर्म में विश्वास तक न रहे, या नैतिक मामलों में कुछ हद तक काथलिक शिक्षा को स्वीकार न करे, जैसे- कृत्रिम संतति नियंत्रण, गर्भनिरोधक, गर्भपात, नसबंदी, तलाक आदि।
इसलिए कलीसिया 'विजातीय विवाहों' को प्रोत्साहन नहीं देते।
यहाँ पर एक विजातीय विवाह का उदाहरण है, जो एक अपवाद साबित हुआ है।
एक काथलिक लड़की ने धर्म के मामले में बड़े सोच-विचार के बाद अंत में एक गैर काथलिक से मँगनी कर विवाह कर लिया। उसने बारम्बार और दावे के साथ यह प्रतिज्ञा की कि वह कभी भी उसके विश्वास के मामले में बाधक नहीं होगा।
विवाह के तुरंत बाद उसे इस बात का पता चला कि किसी भी धर्म के लिए उसके पति के पास थोड़ा सा आदर है। धर्म को भी वह जानता तक नहीं था। जल्दी ही वह उसके परिवार को मिस्सा में भाग लेने के मामले को लेकर कुड़बुड़ाने लगा और हर तरह की बाधा खड़ी करने लगा।
इस बात से वह दुःखी थी फिर भी अडिग रही। अब उसे डराने-धमकाने भी लगा। यह बात एक दिन अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई। जब एक परिवार को सुबह उस व्यक्ति ने बड़े गुस्से में लकड़ी उठाकर कहा कि यदि उसने घर से एक कदम भी बाहर रखा तो उसकी खूब पिटाई करेगा।
उसने धड़कते हृदय और हिम्मत के लिए प्रार्थना करते हुए, शांति से अपना कोट और स्कार्फ पहना और जल्दी से उसके मायके सामने से चलते हुए द्वार पार कर गई।
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