सुसमाचार- सुसमाचार में प्रभु का वचन पढ़ने से पहले याजक, उसे क्रूस के चिह्न से अंकित करते हैं, यह दिखाने के लिए कि यह क्रूसित ख्रीस्त की शिक्षा है। यह नियम हो गया है कि ईशवाणी को आदर देने के लिए खड़े हो जाएँ और हमारे मस्तक, होठों और हृदय पर क्रूस का चिह्न बनाते हुए प्रार्थना करें कि ख्रीस्त की शिक्षा हमारी बुद्धि को भर दे, हमेशा हमारे होठों पर रहे और हमारे हृदयों को ईश्वर को अधिक प्यार करने को प्रेरित करे।
निसेया का धर्मसार- हमारे विश्वास की घोषणा है। हम ईश्वर को धन्यवाद दें कि जिस पर प्रेरितों ने और संतों ने विश्वास किया, उसी पर विश्वास करने की ईश्वर ने हमें कृपा प्रदान की।
2. परमप्रसाद की धर्म विधि- रोटी और दाखरस का चढ़ावा- हम अब खास 'बलिदान' आरंभ करते हैं। भेंट के समय हम रोटी और दाखरस के प्रतीक में अपने को ईश्वर को चढ़ाते हैं और यह प्रार्थना सब कुछ अभिव्यक्त करने में मदद करती है, 'हे प्रभु आज हम तुझे, अपनी प्रार्थनाएँ, कार्य, खुशियाँ और कष्टों को अर्पित करते हैं। हमें अनन्त पिता से संयुक्त कर और यह कहना सिखा, तुम्हारी इच्छा पूरी हो।'
भेंट करना- अब याजक प्रार्थना बोलता है, जिसमें वह ईश्वर से पवित्र बलिदान स्वीकारने की याचना करता है और हमें भरपूर कृपाओं और आशीषों से भर देने की याचना करता है।
यूखारिस्तीय प्रार्थना- ख्रीस्त वेदी पर एक बलि के रूप में आने वाले हैं। उससे संयुक्त हो, हम स्वयं को, अनन्त पिता को स्वीकार्य बलि स्वरूप चढ़ाते हैं। गर्व को त्यागते, गुस्से को दबाते, विषय-वासनाओं को और प्रत्येक दुर्वासनाओं को नीचे दबाते बलि स्वरूप चढ़ाते हैं। हमारे हृदयों को परिवर्तित करते हैं कि प्रत्येक पाप का मार्ग अवरुद्ध हो जाए और वह जो आध्यात्मिक जीवन को बढ़ावा देता है, उत्साहपूर्वक विकसित हो।
अवतरणिका- पिता ईश्वर से धन्यवाद की प्रार्थना है, जिसने अपने दिव्य पुत्र को हमारी मुक्ति के लिए दे दिया।
परिवर्तन- यहाँ से पुरोहित बोलते हैं। अपने स्वयं या विश्वासियों के नाम से नहीं, परन्तु ख्रीस्त के नाम पर। यहाँ वह हमारे प्रभु के शब्दों को दोहराते हैं, जो रोटी और दाखरस को ख्रीस्त के शरीर और रक्त में बदलता है। हम स्वयं को हमारे स्वर्गीय पिता को, महिमामय बलि ख्रीस्त के साथ चढ़ाते हैं।
3. परमप्रसाद विधि- प्रभु की प्रार्थना- हे हमारे पिता, हम ईश्वर की महिमा और हमारी व्यक्तिगत और सामूहिक आवश्यकताओं के लिए प्रार्थना करते हैं।
परमप्रसाद की प्रार्थना- हमारे पापों के लिए ईश्वर से क्षमा याचना करते हुए, उसकी और अधिक भक्ति के लिए समस्त ख्रीस्तीयों के बीच शांति और एकता के लिए एवं शरीर और आत्मा के स्वास्थ्य और कृपा के लिए हम याजक के साथ प्रार्थना कर सकते हैं।
पवित्र परमप्रसाद- याजक स्वयं परमप्रसाद लेता है और तब वह विश्वासियों को परमप्रसाद बाँटता है।
प्रसाद प्रार्थना- धन्यवाद की प्रार्थना है... इसके बाद याजक सब को आशीर्वाद देते हैं।
जितने बेहतर हम ख्रीस्तयाग का अनुसरण करते हैं, हम अधिकाधिक कृपा ग्रहण करते हैं और अधिक ईश्वर की महिमा करेंगे और मनुष्य की मुक्ति प्राप्त करेंगे।
'पूर्वानुमानित' या संध्याकालीन ख्रीस्तयाग- 'यूखारिस्तीय रहस्य की उपासना पर अधिकृत निर्देश' उल्लेख करता है कि जब रविवार के ख्रीस्तयाग को पूर्ण करने के लिए उसके पूर्व संध्या, शनिवार शाम को ख्रीस्त की अनुमति दी जाती है तो यह ख्रीस्तयाग संध्या को ही हो सकती है। ख्रीस्तयाग के समय का निर्धारण स्थानीय बिशप द्वारा होता है। ख्रीस्तयाग में प्रवचन और विश्वासियों की प्रार्थना होती है। इस तरह का ख्रीस्तयाग हुक्म पर्व की पूर्व संध्या को भी लागू होता है। विश्वासीगण जो रविवार या हुक्म पर्व का ख्रीस्तयाग पूर्व संध्या को सम्पन्न करते हैं, वे शाम के वक्त भी परमप्रसाद ग्रहण कर सकते हैं, जो भी उन्होंने सुबह को ही परमप्रसाद ग्रहण कर लिया है।
सहानुष्ठानित ख्रीस्तयाग- उचित ढंग से बलिदान और पुरोहिताई की एकता को प्रदर्शित करता है। इसके अतिरिक्त, जब विश्वासी इसमें सक्रिय तौर पर भाग लेते हैं तो ईश्वर के लोगों की एकता आश्चर्यजनक रूप से प्रकट होती है। उस समय विशेष तौर से यदि धर्माध्यक्ष महायाजक हो... सहानुष्ठान पुरोहित के भाईचारे के बंधन को दोनों प्रतीक द्वारा प्रकट करता और शक्ति देता है... यद्यपि प्रत्येक याजक अकेले ही ख्रीस्तयाग चढ़ाने का अधिकार रखता है। यह न्यायसंगत है कि पुरोहितगणों को, ख्रीस्तयाग इसी महान तरीके से चढ़ाना चाहिए।
पवित्र परमप्रसाद पवित्र यूखारिस्त को 'विश्वास का रहस्य' कहा जाता है।... और यह सच है। स्वयं ख्रीस्त ने कहा था, 'धन्य हैं वे जिन्होंने नहीं देखा, परन्तु फिर भी विश्वास करते हैं।'
फ्रांस के राजा संत लुईस के समय में, पेरिस में, पेरिस के एक गिरजाघर में सुबह के समय बड़ी ही उत्तेजना थी। बड़ी वेदी पर ख्रीस्तयाग चढ़ाया जा रहा था और वहाँ जो भी उपस्थित थे, उन्होंने हमारे प्रभु येसु ख्रीस्त को पवित्र होस्तिया में बालक के रूप में देखा। यह बात तुरंत ही चारों ओर फैली और स्वाभाविक ही है कि इस आश्चर्य को देखने लोग दौड़कर आने लगे।
राजा, अपने स्वयं के छोटे प्रार्थनालय में ख्रीस्तयाग सुन रहा था, किसी ने दौ़ड़कर इस बात की खबर राजा को दी, परन्तु वह जहाँ था वहीं रहा।
'हमारा प्रभु जिस तरह वहाँ मौजूद है, यहाँ भी है।' उसने कहा, 'ऐसे चमत्कार अविश्वासियों के लाभ के लिए होते हैं। उन्हें ही जाने दो और देखने दो जो विश्वास नहीं करते। मेरे लिए मेरा विश्वास काफी है। मैं अपने प्रभु की वास्तविक उपस्थिति में विश्वास करता हूँ, क्योंकि उसने ऐसा ही कहा था।'
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