येसु अभी भी हमारे साथ हैं-
1. अपने वचन में (बाइबिल) 2. सात संस्कारों में... 3. ख्रीस्तीय समाज में (कलीसिया) 4. और विशेषकर ख्रीस्तयाग में
बाइबिल में हम पढ़ते हैं कि, 'उनके भोजन करते समय येसु ने रोटी ली और उसे आशीष देकर तोड़ा और अपने शिष्यों को देते हुए कहा, 'लो और खाओ, यह मेरा शरीर है।' तब कटोरा लेकर धन्यवाद दिया और यह कहते हुए उन्हें दिया, 'इसमें से सबके सब पी लो, क्योंकि यह मेरा लहू है, व्यवस्थान का लहू, जो बहुतों के लिए बहाया जा रहा है कि उन्हें पापों की क्षमा मिले।' (मत्ती 26:26-28)
संत पौलुस ने अपने साथी ख्रीस्तीयों को लिखते हुए बहुत ही साधारण शब्दों में लिखा, 'मेरे प्यारे मित्रों, मूर्ति पूजा से दूर भागिए। मैं आप लोगों को बुद्धिमान समझकर यह कह रहा हूँ, मेरी बातों पर आप स्वयं विचार करें। आशीर्वाद का जो कटोरा हम आशीषते हैं, क्या उससे हम ख्रीस्त के रक्त में सहभागी नहीं होते? और जो रोटी हम तोड़ते हैं, क्या उससे हम ख्रीस्त के शरीर में सहभागी नहीं होते?' (1. कु. 10:14-16)
और फिर वे उन्हें याद दिलाते हैं, 'जो कोई भी अयोग्य रीति से यह रोटी खाता और प्रभु के कटोरे में से पीता है, वह प्रभु के शरीर और रक्त का दोषी होगा।' (1 कु. 11:27)
बोलचाल की भाषा में- बलिदान से हमारा तात्पर्य है किसी को भेंट या उपहार देना। क्या यह सच नहीं है कि जब हम किसी को अपना प्यार जताने की इच्छा करते हैं तो हम उपहार भेंट नहीं करते? या जब हम किसी को अपनी कृतज्ञता प्रकट करने की इच्छा करते हैं तो क्या भेंट नहीं देते? इसलिए मनुष्य के लिए अधिक स्वाभाविक कुछ भी नहीं है बजाय बलिदान देने या पुरस्कार देने के।
धर्म में बलिदान से हम समझते हैं, केवल ईश्वर को ही भेंट या बलिदान चढ़ाना।
पुराने व्यवस्थान में, हम हाबिल द्वारा ईश्वर को चढ़ाए गए मेमने के विषय में पढ़ते हैं। वह अपनी समृद्धता के लिए ईश्वर को धन्यवाद देना चाहता था। उसने उसे इसलिए मारा कि वह, यह निश्चित करना चाहता था कि कोई भी उसे न ले। जल प्रलय के बाद नोवा ने स्वयं को और अपने परिवार को बचाने के लिए, ईश्वर को कपोत का बलिदान चढ़ाया। उसने उसे खत्म कर दिया, क्योंकि वह ईश्वर को दिया गया था और उसे कोई दूसरा न पा सके।
पिछली कुछ शताब्दियों से प्रत्येक धर्म में ईश्वर को (एक या दूसरे प्रकार की) भेंट अर्पण की है। बलिदान का यह विचार ही मनुष्य के दिमाग में गहरा होता है, कि सब के सृष्टिकर्ता और सहारे की आराधना करने और उसे धन्यवाद भी देने... पापों की क्षमा माँगने... और ईश्वर से कृपाओं और आशीष की याचना करते हेतु मनुष्य अपनी सबसे बढ़िया वस्तु ईश्वर को चढ़ाता है।
चूँकि मनुष्य ने सदा से ही ईश्वर को बलिदान चढ़ाने को महत्वपूर्ण समझा है। अतः उन्होंने कुछ विशेष व्यक्ति की नियुक्ति की है कि वे उनके लिए बलिदान चढ़ाएँ। ये मनुष्य पुरोहित कहलाते हैं। एक पुजारी या पुरोहित वह व्यक्ति होता है, जो अपने साथी व्यक्तियों के लिए ईश्वर को बलिदान चढ़ता है।
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