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मेल-मिलाप का संस्कार
(प्रायश्चित और पाप स्वीकार)
ख्रीस्त चाहता था कि यह शक्ति दूसरों को भी बाँट दी जाए, इसलिए उसने कलीसिया की स्थापना की और दुनिया के अंत तक के लिए लोगों को संस्कार प्रदान किए।

'इसलिए जाओ, जब जातियों को शिष्य बनाओ, उनको पिता और पुत्र और पवित्रात्मा के नाम में बपतिस्मा दो और जो-जो आज्ञाएँ तुम्हें दी हैं, उन सबका पालन करना उन्हें सिखलाओ। और सुनो, संसार के अंत तक मैं सब दिन तुम्हारे साथ हूँ।' (मत्ती 28:19-20)

क्या पाप स्वीकार कठिन है?
यह कठिन नहीं है। यह सामान्य और स्वाभाविक है। जब एक व्यक्ति उलझन में रहता है, तब और किसी से कहकर मन की शांति प्राप्त करना चाहता है और मन की शांति प्राप्त करने के लिए पाप स्वीकार पीठिका के अलावा और कोई दूसरी अच्छी जगह नहीं है। सबसे बड़ी सांत्वना की बात तो यह होती है कि पुरोहित बहुत ही सख्त रहस्य से बँधा होता है कि तुम्हारे पापों को किसी को कभी नहीं बताएगा। हम इसको 'पाप स्वीकार की मुहर' कहते हैं। (जो चाहते हैं, उनके लिए आमने-सामने पाप स्वीकार करने की अनुमति है)।

स्वयं पुरोहित पाप क्षमा करता है
हाँ, स्वयं पुरोहित को पाप क्षमा करने की शक्ति है। क्या ख्रीस्त ने अपने प्रेरितों से नहीं कहा था? 'जिनके पाप तुम क्षमा करते हो, उनके क्षमा होते हैं और जिनके पापों को तुम रोक रखते हो, उनके रुके रहते हैं। (यो. 20:25)

पाप स्वीकार क्यों?
यदि ईश्वर चाहता तो तुम्हारे पाप प्रत्यक्ष में क्षमा कर देता, लेकिन वह चाहता है कि मनुष्य उसके प्रेरितों और उनके उत्तराधिकारियों, पुरोहितों द्वारा निर्देशित किए जाएँ, क्योंकि हमें एक मानव न्यायाधीश की आवश्यकता है, जो हमारी अंतःकरण की कठिन समस्याओं में मदद कर सके और इसलिए उसने पाप क्षमा करने की शक्ति प्रदान की। जब उसने अपने प्रेरितों से कहा, जिनके पाप तुम क्षमा कर दोगे, उनके क्षमा हो जाते हैं, जिनके रोक रखोगे, उनके रुके रहते हैं।' (योहन 20:23)

बारम्बार पाप स्वीकार- पाप शंकालु व्यक्तियों और जो मूर्खतापूर्ण उत्सुकताओं से चिंतित रहते हैं, उनके लिए सलाह योग्य नहीं है।

बारम्बार पाप स्वीकार को उपयुक्त बताया गया है, क्योंकि इसमें...
(क) प्रतिदिन के अंतःकरण की जाँच से स्वयं का वास्तविक ज्ञान बढ़ता है।
(ख) ख्रीस्तीय नम्रता विकसित होती है।
(ग) बुरी आदतें सुधरती हैं।
(घ) आध्यात्मिक लापरवाही और शिथिलता पर विजय प्राप्त होती है।
(ङ) अंतःकरण की शुद्धि होती है।
(च) इच्छाशक्ति सुदृढ़ होती है।
(छ) स्वयं पर वश (काबू) प्राप्त किया जाता है।
(ज) और कृपा, स्वयं संस्कार के गुणों में वृद्धि करती है।
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