पवित्रात्मा के सात वरदान 1. विवेक- ईश्वरीय वस्तुओं की इच्छा। यह हमारा संपूर्ण जीवन ईश्वर की ओर इंगित करता है।
2. समझदारी- हमारे विश्वास को और भी सुस्पष्ट तरह से जानने में सहायता करता है।
3. परामर्थ- किसी भी चीज (कार्य) को अच्छी तरह से करने की तत्परता।
4. ज्ञान- सब चीजों को देखने एवं करने के योग्य बनाता है, जो हमारी मुक्ति में सहायक है।
5. धैर्यता- ख्रीस्तीय जीवन में दृढ़ता लाता है। विश्वास की घोषणा में हिम्मत, दुःख, कष्टों एवं प्रलोभनों में धैर्यता एवं दृढ़ता देता है।
6. धार्मिकता- ईश्वर की सेवा, प्यार, भक्ति-आराधना करने की स्थिति। यह हमें धर्म पर विश्वास के साथ चलने की सहायता देती है। ईश्वर के पितातुल्य प्यार के विषय में सिखाता है और मरिया के मातृत्व के विषय में। धार्मिकता हमें ख्रीस्त की कलीसिया के समस्त सदस्यों से पवित्र भाईचारे एवं हमारे संबंधियों और देशवासियों के प्रति हमारे कर्त्तव्यों को सिखाती है।
7. प्रभु का भय- ईश्वर के प्यार के प्रति सदैव आदर की भावना एवं उसमें संयुक्त होना चाहिए।
पवित्रात्मा के ये समस्त पुण्यफल और वरदान एक ख्रीस्तीय को कलीसिया के साथ अच्छी तरह पूर्णता से बाँधते और उसे विशेष आध्यात्मिक शक्ति से परिपूर्ण करते हैं कि वह इस संसार में ख्रीस्त का एक योग्य शिष्य (गवाह) बनकर रहे।
'दृढ़ीकरण' शब्द का अर्थ है शक्ति देना। जिस व्यक्ति को दृढ़ीकरण संस्कार दिया जाता है, उसे साक्ष्य देने की शक्ति दी जाती है, कलीसिया का वह उत्तरदायी सदस्य होता है- दूसरों को इस जीवन में भागी बनाने में तत्पर रहता है, जबकि साथ ही साथ ख्रीस्त के प्रति अपनी प्रतिज्ञाओं को, वचनों एवं कार्यों से दर्शाता है।
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