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दृढ़ीकरण संस्कार
अकसर धर्माध्यक्ष ही दृढ़ीकरण संस्कार देते हैं। (किसी विशेष परिस्थिति में पुरोहित को भी इस संस्कार को देने की आज्ञा दी जाती है।)... जब धर्माध्यक्ष (या पुरोहित) इस संस्कार को देते हैं, वे अपना हाथ इस संस्कार को ग्रहण करने वालों पर फैलाते हैं, प्रार्थना करते हैं कि वे पवित्रात्मा को ग्रहण करें और अपना हाथ प्रत्येक व्यक्ति के सिर पर रखते हुए पवित्र तेल से कपाल पर क्रूस का चिह्न बनाते-मलते हुए कहते हैं, 'मैं तुम्हें क्रूस के निशान से चिह्नित करता हूँ और तुम्हें मुक्ति के तेल से अभ्यंजित करता हूँ पिता, पुत्र और पवित्रात्मा के नाम पर।'

यह तर्क सिद्ध करता है कि हम विश्वास को सही तरीके से नहीं समझ सकते, जब तक कि हम उसे अच्छी तरह से नहीं समझें। और न ही हम अपने आप में जीवित रह सकते हैं, जब तक कि हमारे विश्वास का ज्ञान हमारी बुद्धि और शरीर जैसा नहीं बढ़ता।

हम जिनका अध्ययन स्कूल या गिरजा में करते हैं, वह हमारा विश्वास बनाने के लिए अच्छी नींव है, फिर भी हमारे संपूर्ण जीवन में हमें अपने विश्वास के ज्ञान को जो हममें मौजूद है, अध्ययन करना एवं दृढ़ करना चाहिए।

दृढ़ीकरण संस्कार में पवित्रात्मा हमें कई वरदान देता है, जो हमें मदद एवं शक्ति देते हैं और हमारे लिए जैसा ईश्वर हमसे चाहते हैं वैसा प्यार करना संभव बनाता है।

पवित्रात्मा के 12 फल हैं-
1. सद्भावना- संतों के उदाहरण जो शब्दों और कार्यों में निहित हैं।

2. आनंद- अच्छे अंतःकरण की खुशी और तृप्ति जो कि सदाचरण से आती है।

3. शांति- ईश्वर, दूसरों एवं स्वयं के संग आत्मा के विश्राम की स्थिति।

4. धैर्य- दूसरों की असफलता को सहन करने की शक्ति।

5. सौम्यता- वचनों एवं कार्यों को दयालुता एवं अनुकम्पा के साथ कहना या करना।

6. भलाई- दूसरों की सहायता (सेवा) करने को तत्पर रहना और दूसरों के हृदय की भावना को चोट न पहुँचाना।

7. सहनशीलता- कष्टों एवं दुःखों को धीरता से सहन करने की स्थिति, अच्छे कार्य में लगे रहना और अकृतज्ञता एवं असफलता में उदासीन रहना।

8. कोमलता- दूसरों के साथ संबंध (व्यवहार) बनाए रखने में हमारी भद्रता।

9. विश्वास- प्रतिज्ञाओं में सत्यता, वफादारी और विश्वास।

10. शलीनता- बाहरी वचनों, पहरावे एवं आचरण में सादगी।

11. संयम- गुस्से में फूट पड़ना, अधैर्यता और विषय-वासनाओं से बचे रहना।

12. पवित्रता- उन साधनों का उपयोग करना (ख्रीस्तयाग, संस्कार एवं प्रार्थनाएँ), जिन्हें ईश्वर ने दिए हैं कि हम सादगी और पवित्रता से जीवन बिताएँ।
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