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प्रथम संस्कार : स्नान संस्कार
जब पानी का बपस्तिमा... जो कि सामान्य तरीका है... नैतिकता या शारीरिकता से असंभव होता है तो ऐसी स्थिति में अनन्त जीवन प्राप्त करने हेतु इच्छा का बपतिस्मा या रक्त का बपतिस्मा प्राप्त किया जा सकता है।

जल का बपतिस्मा- स्नान संस्कार पाने वाले व्यक्ति के कपाल पर पानी डालते हुए दिया जाता है और पानी डालते हुए यह कहा जाता है, 'मैं तुम्हें पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम में बपतिस्मा देता हूँ।' (मत्ती 28:19)

इच्छा का बपतिस्मा का अर्थ है, वे प्रत्येक जिनकी हार्दिक इच्छा होती है कि जो कुछ ईश्वर चाहता है, वह करें और पाप का पूर्ण प्रायश्चित हो- वे स्वर्ग पा सकते हैं। कलीसिया 'डुबाने' या 'छिड़कने' के बजाय 'डालना' क्यों कहती है?

क्योंकि शुरुआत के दिनों से ऐसा ही होता था और बहुत अधिक व्यवहारिक था!... क्योंकि शिशुओं या जो अस्तपतालों या जेलों में होते थे, उन्हें डुबाना असंभव होता था।

रक्त का बपतिस्मा या उनके द्वारा लिया जाता है जो ख्रीस्त के लिए मरते या दुःख भोगते हैं... और जिन्हें पानी का बपतिस्मा नहीं दिया जा सकता।

स्नान संस्कार देने वाला साधारणतया एक पुरोहित होता है... परन्तु आवश्यकता के समय जैसे मृत्यु के खतरे में कोई भी साधारण बुद्धि वाला बपतिस्मा दे सकता है और जो बपतिस्मा देता है, वह बपतिस्मा लेने वाले के सिर पर यह साधारण पानी डाले- 'मैं तुम्हें पिता, पुत्र पवित्रात्मा के नाम में बपतिस्मा देता हूँ।' (मत्ती 28:19)

बपतिस्मा के लिए कितने उत्तरदाताओं (धर्म माता-पिता) की आवश्यकता है?

एक ही आवश्यक है... काथलिक धर्म का मानने वाला हो और उसी लिंग का हो।

क्यों बपतिस्मा का नाम जरूरी है? नाम से अधिक इसमें बहुत कुछ है। अपनी पहचान क्यों खोना? सिर्फ तुम्हारे नाम को जानकर सबों को यह मालूम होना है कि तुम ख्रीस्तीय हो। अभिन्न रहने की हिम्मत है।

हम सिक्खों को उनके नाम से जानते हैं, मुसलमानों को उनके नाम के तो ख्रीस्तीयों को उनके नाम से जानने में क्या बुराई है? जबकि उपनाम आसानी से बदले जा सकते हैं... बपतिस्मा के नाम को ऐसा नहीं होना चाहिए। उन्हें ख्रीस्तीय होना चाहिए।
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