मरिया, योसेफ की धर्म पत्नी थी, जो बढ़ई का काम करता था। वे नाजरेथ में रहते थे। एक दिन स्वर्गदूत गाब्रिएल ने उसे दर्शन देकर कहा- 'प्रणाम, कृपापूर्ण, प्रभु आपके साथ है, धन्य हैं आप स्त्रियों में।'
यह सुनकर मरिया चकित रह गई, परन्तु स्वर्गदूत ने उन्हें सांत्वना देते हुए यह कहा कि वे ईश्वर की माता बनने के लिए चुनी गई हैं। तब मरिया ने उत्तर दिया, 'देखिए, मैं प्रभु की दासी हूँ, आपका वचन मुझमें पूरा हो।'
उसी क्षण से वह ईश्वर की माता बन गई। कुछ समय के बाद मरिया और योसेफ अपना नाम लिखवाने बेथलेहेम गए और कहीं भी जगह न मिलने पर वे एक एकांत गुफा में आए, जो शहर से बाहर थी और वह यही स्थान था, जहाँ येसु का जन्म हुआ। मरिया ने उसे शिशु वस्त्र में लपेटा और चरनी में लिटा दिया। उसी समय उन्हें स्वर्गदूतों का मधुर गीत, ईश्वर की स्तुति करता सुनाई दिया-
'उच्च आकाश में ईश्वर की महिमा, और पृथ्वी पर उसके कृपापात्रों को शांति।'
पास ही पहाड़ियों के गड़ेरिये स्वर्गदूतों के निमंत्रण पर नन्हें येसु की आराधना करने गए।
अब पूछा जा सकता है कि यह नन्हा येसु कौन है? यह येसु ख्रीस्त दुनिया का मुक्तिदाता है, ईश्वर का पुत्र, सच्चा ईश्वर और सच्चा मनुष्य।
संत योहन (1:34) लिखते हैं, 'मैंने देखा और इस बात की साझी देता हूँ कि यही ईश्वर का पुत्र है।'
मिस्र में कुछ समय रहने के बाद वे नाजरेथ लौट आए, जहाँ योसेफ फिर से बढ़ई का धंधा करने लगा। जब येसु करीबन 30 वर्ष के हुए तो उन्होंने घर छोड़ दिया। अपना सुसमाचार सुनाना आरंभ किया, आश्चर्य के काम किए और अपनी कलीसिया की स्थापना की।
संत मत्ती ने लिखा, (4:23) 'येसु, सारे गलीलिया में घूम-घूमकर उनके सभाघरों में उपदेश देते, राज्य के सुसमाचार की घोषणा करते और लोगों के बीच हर तरह की बीमारी और सब प्रकार की दुर्बलताएँ दूर करते थे। उनकी प्रसिद्धि सारे सीरिया में फैल गई।'
यह अकसर होता है कि जो लोग दूसरों के लिए कुछ अच्छा काम करते हैं, तो उनके अनेक शत्रु हो जाते हैं। उसी तरह से प्रभु येसु ख्रीस्त के द्वारा किए जाने वाले भले कामों के कारण उनके भी अनेक शत्रु हो गए थे। उनका शिष्य, जिसका नाम यूदस था, उसके शत्रुओं से यहाँ तक मिल गया कि वह मात्र चाँदी के तीस सिक्कों पर विश्वासघात करने पर तैयार हो गया।
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